बिना राम के आदर्शों का चरमोत्कर्ष कहां है?

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डॉ जंगबहादुर पांडेय

भक्त शिरोमणि कविकुल दिवाकर गोस्वामी तुलसीदास भारत के मंदिर को आलोकित करने वाले सर्वोत्तम प्रकाश-स्तम्भ हैं। उन्होंने अपनी काव्य-साधना द्वारा भारतीय जीवन, धर्मदर्शन तथा संस्कृति को अनुप्राणित किया है। उनका साहित्य काव्य दर्शन तथा भक्ति की त्रिवेणी है। तुलसीदास हिंदी साहित्य में विशिष्ट गौरव के अधिकारी हैं।

शीलोत्कर्ष विधायिनी भारतीय संस्कृति के उन्नायक तुलसी भारतीय साहित्य ही नहीं अपितु विश्व साहित्य की महान विभूति है। भारतीय समाज जिस समय अत्याचार सामाजिक वैष्मय एवं राजनीति शोषण तथा धार्मिक आडम्बरों से घिरा हुआ था। उस समय कवि की सर्वोत्तन्मुखी पाण्डित्य-प्रतिभा ने उसे जीवन का आधार देकर सशक्त बनाया था। तुलसी राम के अनन्य भक्त हैं। अस्तु राम व्यक्ति नहीं आदर्श की प्रतिमूर्ति हैं।

राम व्यक्ति को नहीं,

वृति को प्राप्त हुई संज्ञा हैं।

राम हमारा चिंतन दर्शन,

प्रीति प्रकृति प्रज्ञा है।

राम चिरंतन जीवन मूल्यों,

का स्वर्णाभ शिखर हैं।

राम हमारी संस्कृति का’

सारस्वत हस्ताक्षर हैं।

राम हमारा कर्म ,हमारा धर्म

हमारी मति है।

राम हमारी भक्ति, हमारी शक्ति

हमारी गति है।,

बिना राम के आदर्शो का चर्मोंत्कर्ष कहाँ है?

बिना राम के इस भारत में भारत वर्ष कहाँ है?

उन्होंने राम के चरित का आधार लेकर मानव जीवन की जितनी व्यापक और सम्पूर्ण समीक्षा की है उतनी हिंदी साहित्य के किसी  अन्य कवि ने नहीं की है। इस समीक्षा के साथ ही उन्होंने लोकशिक्षा का भी ध्यान रखा और मानव जीवन में ऐसे आदर्शो की स्थापना की जो विश्वजनीन है और समय के प्रवाह से नहीं बह सकते।

तुलसी ने इन आदर्शो की भिति पर अपनी भक्ति के स्वरुप की इतनी अच्छी विवेचना की कि वह तत्कालीन धार्मिक अवस्था में पथ-प्रदर्शन का काम कर गयी ।उनकी भक्ति में नीति की धारा मिली हुई है। उन्होंने अपने साहित्य को समाज की आधारभूत आवश्यकताओं के अनुरूप निर्मित किया, यही उनकी सबसे बड़ी देन है।

तुलसी ने अपने काव्य प्रयोजन को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि कीरति भनीति भूति भली सोई। सुरसरि सम सब कह हित होई।।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की चारित्रिक उदारता एवं महानता को लेकर रामचरितमानस और विशिष्ट बन गया है। मानस में शील, शक्ति और सौंदर्य सर्वत्र परिव्याप्त है। मानस के सभी आदर्श पात्र तप, त्याग  परोपकार और प्रेम की साक्षात् प्रतिमूर्ति है।

चक्रवर्ती सम्राट दशरथ का पुत्र प्रेम में देह त्याग ,राम का पितृ-प्रेम में अयोध्या के सुख का त्याग, कोमलागिनी सीता का पति प्रेम में ऐश्वर्य-त्याग, भाई राम के लिए लक्ष्मण का पत्नी का त्याग, भाई भरत का राम के लिए अयोध्या के सिंहासन का त्याग किया, मानस आदि से अंत तक त्याग की महागाथा है।

तुलसी की गुणोत्कृष्टता पर प्रकाश डालते हुए तुलसी साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि *यदि कोई पूछे कि जनता के हृदय पर सबसे अधिक विस्तृत अधिकार रखने वाला हिंदी का सबसे बड़ा कवि कौन है? तो उसका एकमात्र यही उत्तर ठीक हो सकता है कि भारत हृदय, भारतीय कंठ भक्त चूड़ामणि गोस्वामी तुलसीदास।

एक बार रामकथा के मर्मज्ञ विदेशी विद्वान डॉ फादर कामिल बुल्के ने तुलसी जयंती के पावन पुनीत अवसर पर बोलते हुए कहा था – *अगर भारत से स्वदेश (बेल्जियम) लौटते समय मुझे केवल एक ही पुस्तक ले जाने की इजाजत दी जाए ,तो वह  बाईबिल नहीं ,तुलसी का रामचरितमानस होगा।

तुलसी का मानस राम राज की स्थापना के कारण शिष्ट और विशिष्ट बन गया है। जहां समता स्वतंत्रता और भ्रातृत्व की त्रिवेणी प्रवाहित है। तीनों प्रकार के तापों का शमन और निर्मूलन है:-

राम राज बैठे त्रैलोका।

हरषित भरे गये सब सोका।

दैहिक दैविक भौतिक तापा।

राम राज काहुं नहि व्यापा।

सब नर करहिं परस्पर प्रीती।

चलहि स्वधर्म निरत श्रुति नीती।

दंड जतिन्ह कर भेद कहं नर्तक नृत समाज।

मांगे वारिद देहि जल, रामचंद्र के राज।

स्वतंत्र भारत में राष्ट्र पिता महात्मा गांधी जी का एक ही सपना था कि यहां राम राज स्थापित हो, लेकिन उनका यह सपना अभी तक पूर्णतः अपना नहीं हो सका है। माननीय नरेन्द्र मोदी जी की सरकार राम राज की ओर सक्रिय है। हमें आशा है 1947 तक राम राज का सपना अपना हो सकेगा। अयोध्या के  राममंदिर में भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा राम राज की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है‌।

भारत की भव्यता और विशालता को दृष्टि में रखकर इस देश के लिए कहा जाता रहा है – आसमुद्रात हिमालय

अर्थात हिमालय इसकी उच्चता और भव्यता का प्रतीक है, तो सागर इसकी व्यापकता और विशालता का । तुलसीदास एक साथ ही भारत की भव्यता के प्रतीक हिमालय, और उसकी व्यापकता और विशालता के प्रतीक  सागर दोनों की ही सम्मिलित प्रतिमूर्ति हैं।

उनका व्यक्तित्व भारतीय धर्म-साधना का माप है। भारतवर्ष में दो गंगाऐं हैं – एक भौगोलिक, दूसरी सांस्कृतिक। भौगोलिक गंगा गोमुखी से निकलकर उपत्यकाओं में प्रवाहित होती हुई अंत में अनन्त सागर से जा मिलती है, सांस्कृतिक गंगा तुलसी मुखारबिंद से निकलकर मानस के रूप में जनमानस को परिपल्लावित करती हुई अंत में अनन्त सागर में शेषशायी विष्णुरूपी राम के चरणों में समर्पित हो जाती है। भौगोलिक गंगा लोक का तीर्थ राज है तो मानस रूपी सांस्कृतिक गंगा लोक मानस का तीर्थ राज। अंत में तुलसी के शब्दों में समस्त सृष्टि के नर नारी को राम सीता मानकर प्रणाम करता हूं:-

सिया राम मय सब जग जानी।

करौं प्रणाम जोरी जुग पानी।

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