इतनी बड़ी सृष्टि को बनानेवाला कोई तो होगा, कौन है वो?

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सुशोभित

ईश्वर को मानने वालों द्वारा अकसर यह तर्क दिया जाता है कि “इतनी बड़ी सृष्टि है, जिसमें सबकुछ नियमपूर्वक हो रहा है- इसको बनाने वाला कोई तो होगा?”

मैं उनसे कहता हूँ- “गुड कोश्चन!” आपने बहुत ही अच्छा सवाल पूछा। आइए, अब इसका जवाब खोजें। और यहीं से आस्थावान की फ़ज़ीहत शुरू होती है।

मैं कहता हूँ- “कोई तो होगा”- ये एक अनुमान है, अटकल है। यह प्रमाण नहीं है। आप अनुमान को प्रमाण नहीं मान सकते। सुराग़ सबूत नहीं होता।

किसी मामले की तफ़्तीश कर रही पुलिस को जब कोई सुराग़ मिलता है तो वो फ़ैसले पर नहीं पहुँच जाती।

हाँ, उस दिशा में अपनी जाँच को थोड़ा और पैना ज़रूर कर देती है। आप भी इस दिशा में अपनी जाँच को पैना करो कि यह जो “कोई तो होगा” है, वह कौन है?

अव्वल तो यह जान लें कि कोई चीज़ बनी है, इसका ये मतलब नहीं है कि उसको बनाने वाला भी कोई हो।

चीज़ें इवॉल्व भी हो सकती हैं। वो असेम्बल भी हो सकती हैं। उनका फ़ॉर्मेशन भी हो सकता है। क्रिएशन होना ज़रूरी नहीं है।

सृष्टि को संसृति भी कहा है और संसृति का अर्थ होता है एक गतिशील अवस्था, जिसमें निरंतर कुछ घटित हो रहा है।

स्रष्टा के सिद्धांत के साथ दिक़्क़्त यह भी है कि जब आप कहते हैं कि सृष्टि को किसी ने तो बनाया होगा तो यह प्रश्न भी उठ सकता है कि स्रष्टा को किसने बनाया?

और अगर स्रष्टा स्वयंभू है, वह बिना किसी के बनाए बन गया, तो सृष्टि क्यों नहीं बिना किसी के बनाए बन सकती है?

दूसरे, कोई चीज़ संचालित हो रही है, इसका भी ये मतलब नहीं कि कोई उसका संचालक है। चीज़ें ऑटो-पायलट मोड में भी अनंतकाल तक चलती रह सकती हैं।

आइज़ैक न्यूटन कहता था, “ग्रैविटी एक्सप्लेन्स द मोशन ऑफ़ द प्लैनेट्स, बट इट कैन नॉट एक्सप्लेन हू सेट्स देम इन मोशन।”

यानी ग्रैविटी यह तो बता सकती है कि प्लैनेट कैसे घूम रहे हैं, लेकिन उनको इस घेरे में किसने डाला है, यह नहीं बता सकती।

तब मैं कहता हूँ, आइए हम सब मिलकर खोजें कि “हू सेट्स देम इन मोशन!”

इस बिंदु पर आकर ईश्वर को मानने वाला घबड़ा जाता है। वो बोलता है खोजना-वोजना मेहनत वाला काम है, दिमाग़ लगाना पड़ता है, सोचना पड़ता है, तुम तो ये बताओ किस चीज़ में मानना है, हम मान लेंगे।

पर बंधु, मानने से काम नहीं चलने वाला, जानने से चलने वाला है। जाने बिना मुक्ति नहीं है, और मानी हुई चीज़ आज नहीं तो कल गच्चा ज़रूर देगी।

“इतनी बड़ी सृष्टि है, जिसमें सबकुछ नियमपूर्वक हो रहा है- इसको बनाने वाला कोई तो होगा।”

यह एक प्रश्न है, यह उत्तर नहीं है। “कोई तो होगा”? लेकिन कौन? यह आप खोजें। मैं भी खोज रहा हूँ।

ईश्वर में आस्था रखने वालों के साथ समस्या यह है कि न केवल उन्होंने इस प्रश्न को ही उत्तर मान लिया है, उन्होंने उत्तर की नानाविध व्याख्याएँ भी कर डाली हैं।

यानी वे न केवल इस नतीजे पर पहुँच चुके हैं कि सृष्टि को बनाने वाला ईश्वर है, बल्कि इस ईश्वर का स्वरूप कैसा है, वह कैसा दिखता है, वह कौन-सी भाषा बोलता है, उसने कौन-से नियम बनाए हैं, वह किस चीज़ को पाप और किसको पुण्य समझता है, क्या करें कि वह प्रसन्न होगा, क्या करें कि हमारे पाप कटेंगे- यह पूरे का पूरा व्यापार भी उसने मान लिया है।

एक पैसे का प्रमाण नहीं है और एज़म्प्शन (अटकलें, अनुमान, कल्पनाएँ) का कोई ओर-छोर नहीं है।

यह ईश्वर को मानने वाला ईश्वर को मानने की इतनी जल्दी में क्यों रहता है? वह दुनिया की दूसरी चीज़ों को तो मानने में जल्दी नहीं करता।

दूसरी चीज़ों को तो वह दस बार जाँचता-परखता है, पड़ताल करता है, चार लोगों से पूछता है, टोहता है, खोजता है।

ईश्वर को वह इतनी फालतू की चीज़ क्यों समझता है कि बिना जाँच-पड़ताल किए मान ले?

क्योंकि वह भीतर से डरा हुआ है। क्योंकि आस्था के आडम्बर के भीतर संशय का महासागर है। चाँदी के वरक़ के नीचे मैल है।

धुकधुकी लगी हुई है कि घर बनाया है, दुकान बनाई है, कुटुम्ब सजाया है, इन सब पर कोई विपत्ति आ गई तो क्या होगा?

यह सोच उसकी रातों की नींदें हराम की हुई है। उसको चाहिए कोई खिलौना, कोई झुनझुना, कोई अललटप्पू हाइपोथीसिस कि भगवान ऊपर बैठा है, वो सब देख रहा है, ऐसा-ऐसा करो तो वह तुम्हारी रक्षा करेगा।

यह अफ़ीम खाने के बाद धर्मालु को बहुत अच्छी नींद आती है। ईश्वर अच्छी नींद लाने की गोली है।

जबकि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि ईश्वर ने आज तक किसी की रक्षा की हो, किसी का कल्याण किया हो, ईश्वर है भी इसी का कोई प्रमाण नहीं है।

और बिना प्रमाण के कुछ मान लेना ही इकलौता पाप है, बंधु!

“इतनी बड़ी सृष्टि है, जिसमें सबकुछ नियमपूर्वक हो रहा है- इसको बनाने वाला कोई तो होगा?” बहुत ही बढ़िया सवाल। अब चलो इसका उत्तर खोजो। मैं भी खोज रहा हूँ, तुम भी खोजो!

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