Raghubar Das: रघुवर दास का राजनीतिक भविष्य : झारखंड भाजपा में वापसी की संभावनाएं और चुनौतियां – आनंद कुमार

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Raghubar Das

झारखंड की राजनीति में रघुवर दास एक प्रमुख नाम रहे हैं, जो निरंतर चर्चा का विषय बने हुए हैं। वे झारखंड के एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने बहुमत वाली सरकार का पांच वर्ष का पूर्ण कार्यकाल पूरा किया। इसके अलावा, उन्होंने 14 महीनों तक ओडिशा के राज्यपाल के रूप में कार्य किया और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे। वर्तमान में प्रश्न यह उठता है कि क्या रघुवर दास सक्रिय राजनीति में पुनः प्रवेश कर पाएंगे, या भाजपा ने उन्हें मार्गदर्शक मंडल जैसी भूमिका में सीमित कर दिया है? उनकी चुनावी विरासत अब उनकी बहू पूर्णिमा दास को हस्तांतरित हो चुकी है और हालिया चुनावों में उन्हें कोई प्रमुख जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई। हालांकि, वे विभिन्न मुद्दों पर सक्रिय बने हुए हैं, जैसे पंचायत (विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों तक) अधिनियम (पेसा) पर वे काफी मुखर रहे हैं।

रघुवर दास का राजनीतिक सफर

रघुवर दास भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं, जिन्होंने जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा क्षेत्र से लगातार पांच चुनावों में विजय प्राप्त की। 2014 में नरेंद्र मोदी की लहर के बीच झारखंड में भाजपा की सरकार बनी और वे राज्य के पहले गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री बने। उनका पांच वर्षीय कार्यकाल झारखंड के इतिहास में एक रिकॉर्ड है, जहां उन्होंने संगठन और सरकार को अनुशासित ढंग से संचालित किया। विकास कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया गया, हालांकि आदिवासी मुद्दों और पथ निर्माण जैसे क्षेत्रों में आलोचना भी झेलनी पड़ी। 2019 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद वे भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने।

2024 में ओडिशा के राज्यपाल नियुक्त हुए, जहां उन्होंने भाजपा सरकार के गठन में योगदान दिया। दिसंबर 2024 में इस्तीफा देकर वे जनवरी 2025 में भाजपा में पुनः शामिल हुए और प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि पार्टी जल्द सत्ता में लौटेगी। यह बयान उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को दर्शाता है, लेकिन क्या यह व्यावहारिक रणनीति है या मात्र वक्तव्य?

वर्तमान स्थिति और सक्रियता

रघुवर दास की चुनावी विरासत अब पूर्णिमा दास को स्थानांतरित हो गई है, जिन्हें 2024 के चुनाव में टिकट प्रदान किया गया। हालांकि, रघुवर दास को स्वयं झारखंड या बिहार चुनावों में स्टार प्रचारक की भूमिका नहीं मिली, जो संकेत देता है कि पार्टी उन्हें सक्रिय राजनीति से दूर रख रही है। क्या यह मार्गदर्शक मंडल जैसी स्थिति की ओर इशारा है, जहां वरिष्ठ नेता जैसे लालकृष्ण आडवाणी या मुरली मनोहर जोशी को रखा जाता है? फिर भी, वे निष्क्रिय नहीं हैं। दिसंबर 2025 में पेसा नियमावली पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन्होंने हेमंत सोरेन सरकार की आलोचना की, इसे आदिवासियों के लिए ‘लॉलीपॉप’ बताते हुए मूल भावना के विपरीत करार दिया। उनके समर्थकों ने इस मुद्दे पर सरकार के कदम का श्रेय उन्हें दिया। समय-समय पर अफवाहें उड़ती हैं कि वे झारखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष या यहां तक कि जेपी नड्डा के उत्तराधिकारी के रूप में राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उनके समर्थकों के पोस्ट इस उम्मीद को मजबूत करते हैं कि उनकी वापसी से पार्टी मजबूत होगी।

चुनौतियां और आंतरिक गतिशीलता

रघुवर दास की राह सरल नहीं है। उनके कार्यकाल में उभरे कई नेता, जैसे आदित्य साहू (वर्तमान में कार्यकारी अध्यक्ष), अब दूसरी पंक्ति में हैं और संभवतः दिल्ली नेतृत्व को फीडबैक दे रहे हैं कि रघुवर की उपस्थिति से असुविधा हो सकती है। जब वे राज्य का दौरा करते हैं, तो भीड़ जुटती है, लेकिन दूसरी पंक्ति के नेता असहज महसूस करते हैं। बाबूलाल मरांडी का कारक भी महत्वपूर्ण है; रघुवर के कारण मरांडी असहज थे, जिसके चलते उन्हें राज्यपाल बनाकर हटाया गया। अब मरांडी प्रदेश अध्यक्ष हैं, लेकिन उपचुनाव से लेकर लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार से उनका प्रभाव कमजोर साबित हुआ है। मरांडी गुट रघुवर को आदिवासी-विरोधी बताता है, जबकि भाजपा ने अनुसूचित जनजाति (एसटी) सीटों पर हार झेली है। क्या भाजपा तीसरी पंक्ति के नेताओं, जैसे दिल्ली में सक्रिय नितिन नवीन, में भविष्य तलाश रही है? या अमित शाह स्वयं कमान संभालेंगे?

इसके अतिरिक्त, खरमास (जनवरी 2026 में समाप्त होने वाला) के बाद झारखंड भाजपा में बड़े बदलाव की उम्मीद जताई जा रही है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि संगठन में फेरबदल होगा। बीच में खबरें आईं कि केंद्रीय नेतृत्व हेमंत सोरेन को एनडीए में शामिल करने का प्रयास कर रहा है, जो औद्योगिक घरानों के लिए डबल इंजन सरकार का लाभ प्रदान कर सकता है। हेमंत की दिल्ली यात्राओं से ऐसी अटकलें लगाई जाती हैं, हालांकि उनकी मजबूत सरकार और प्रचंड बहुमत के कारण यह संभावना कम लगती है। यदि ऐसा होता है, तो भाजपा में धारदार नेतृत्व की आवश्यकता कम हो जाएगी।

भाजपा वर्तमान में चुनौतियों का सामना कर रही है; जनाधार से कटाव और प्रभावहीन नेतृत्व प्रमुख मुद्दे हैं। रघुवर दास की दिल्ली में स्वीकार्यता ज्ञात है, लेकिन यदि वे साइडलाइन रहते हैं, तो उनकी रणनीति क्या होगी? उन्होंने कभी विद्रोही रुख नहीं अपनाया, विपरीत बाबूलाल मरांडी ने 14 वर्ष अलग रहकर वापसी की, लेकिन लाभ नहीं हुआ। क्या केंद्रीय नेतृत्व चौंकाने वाला निर्णय लेगा, जैसे नितिन नवीन को अध्यक्ष बनाना?

सहयोगी दलों की भूमिका

एनडीए के सहयोगी आजसू के सुदेश महतो सक्रिय हैं, लेकिन रघुवर युग की वापसी से वे सहज रहेंगे? जयराम महतो की अस्थिर राजनीति भाजपा के अनुकूल नहीं लगती। स्थानीय नेता सुदेश को अधिक उपयुक्त मानते हैं, जबकि जयराम का बंगाल के जंगलमहल क्षेत्र में प्रभाव है। तृणमूल कांग्रेस से उनके संपर्क की खबरें भी हैं, जो ममता बनर्जी की विदाई के संदर्भ में विचारणीय हैं। अंततः, निर्णय दिल्ली स्तर पर होगा।
रघुवर दास का राजनीतिक भविष्य झारखंड की सियासत का प्रतिबिंब है। पेसा जैसे मुद्दों पर उनकी मुखरता और समर्थकों का उत्साह संकेत देते हैं कि उम्मीद बाकी है, लेकिन दूसरी पंक्ति के नेता, बाबूलाल मरांडी का प्रभाव, आदिवासी वोट बैंक की हानि और पार्टी का समग्र संकट प्रमुख चुनौतियां हैं। खरमास के बाद संभावित बदलाव से स्थिति स्पष्ट हो सकती है। क्या रांची या दिल्ली यह निर्णय लेगा? समय ही इसका उत्तर देगा। यह ओपीनियन इस विश्वास पर आधारित है कि अनुभवी नेतृत्व की वापसी से भाजपा मजबूत हो सकती है, लेकिन आंतरिक गतिशीलता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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