सुशोभित
ख़रबूजे़ की मिठास इतनी सौम्य होती है, कि मानो वो संकोच से कहना चाहता हो- “मुझमें माधुर्य नहीं!” किंतु इस कहन की मिठास से लज्जारुण हो चुप लगा जाता हो!
ख़रबूजे़ की सुगंध भी वैसी ही भीनी है। मंडी की हाँक से रसोई की संतुष्टि तक वह चुपचाप लिप जाती है। जैसे उपवन से संदेश लेकर लौटा चैत्र का समीरण!
ख़रबूजे़ का रंग भी कैसा तो निस्संग है। पवित्रता का राग जगाने वाला पीताभ। कहते हैं ख़रबूजे़ को देखकर ख़रबूज़ा रंग बदलता है, जैसे खग ही जानता है खग की भाषा।
खगकुल की बात तो एक बार बूझ भी लूँ, ख़रबूजे़ की बारहखड़ी कैसी होगी, यही सोचता रहता हूं।
कभी मैं भी सुनूँ तो बन सकूँ उस जैसा, इतना गुणी! शकरबाटी कहलाऊँ और तब भी इठलाऊँ नहीं!
रूप-प्रकार, भाव-धर्म में उस जैसा विनयी कोई और नहीं। दिवस पर संध्याएँ जैसे झुक आती हैं, वैसे ही यह हाट में चला आता है। वैसे ही किसी दिन चुपचाप चला भी जाता है, पदचिह्न तक पीछे नहीं छोड़ता।
और, निदाघ में तो यह उपहार है! पुष्टिमार्गीय हवेलियों में गर्मियाँ लगते ही ठाकुरजी का राजभोग बदल जाता है तो थाल में ख़रबूजे़ का पना भी प्रस्तुत किया जाता है।
मैंने आम का पना बहुत पीया है, ख़रबूजे़ का पना कभी नहीं पीया। पीऊंगा भी कैसे? मैं देवता जो नहीं हूँ! वैसे देवद्रव्य का मनोरथ तब कैसे बाँधूं?
किंतु अपने माधुर्य से ही वीतरागी जैसा वह है, वैसा सौम्य ही कभी बन सकूँगा, यह ऐषणा भी तो आकाश-कुसुम-सी दुष्कर!
लेखक : देश के जाने-माने पत्रकार हैं
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