2 incidents in jharkhand
रांची। झारखंड में इस समय दो बड़ी घटनाएं राज्यभर में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। एक ओर खूंटी जिले में आदिवासी नेता सोमा मुंडा उर्फ “पड़हा राजा” की निर्मम हत्या ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, वहीं दूसरी ओर राजधानी रांची के जगन्नाथपुर मंदिर मौसीबाड़ी स्थित मल्लार टोली से दो मासूम भाई-बहन के लापता होने की घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है।
बता दे खूंटी जिले में 7 जनवरी की शाम आदिवासी नेता सोमा मुंडा उर्फ “पड़हा राजा” को उनके ही क्षेत्र में अज्ञात अपराधियों ने ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर हत्या कर दी। घटना के बाद पूरे इलाके में भारी आक्रोश फैल गया। गुरुवार को ग्रामीणों और आदिवासी संगठनों ने जिला बंद का आह्वान किया। प्रमुख सड़कों पर बैरिकेडिंग कर यातायात पूरी तरह ठप कर दिया और हत्यारों की 24 घंटे के भीतर गिरफ्तारी की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया गया। इस दौरान प्रशासन के खिलाफ भी जमकर नारेबाजी हुई। मामले की गंभीरता को देखते हुए शुक्रवार देर रात सदर थाना प्रभारी मोहन कुमार को लापरवाही के आरोप में सस्पेंड कर दिया गया।
वहीं दूसरी ओर राजधानी रांची की तस्वीर बिल्कुल अलग है। यहां 2 जनवरी से दो मासूम बच्चे पांच साल का अंश और चार साल की अंशिका लापता हैं। बता दे दोनों बच्चे बिस्कुट और लॉलीपॉप खरीदने घर से निकले थे, लेकिन वापस नहीं लौटे। परिवार ने आसपास के इलाकों में तलाश की, लेकिन बच्चों का कोई अता पता नहीं मिला। पुलिस ने तालाबों और कुओं में भी खोजबीन की, लेकिन आठ दिन बीत जाने के बाद भी बच्चों का कोई सुराग नहीं मिला। अब ड्रोन से तलाश की बात कही जा रही है। बच्चों के पिता सुनील कुमार का कहना है कि अगर पुलिस पहले दिन से ही गंभीरता दिखाती, तो शायद बच्चे सुरक्षित मिल जाते। परिजनों को लग रहा है कि इतने दिनों बाद भी बच्चों का पता न चल पाना पुलिस की लापरवाही का नतीजा है। सुनील कुमार का कहना है कि यदि पुलिस पहले ही दिन सक्रिय होती, तो शायद आज उनके बच्चे सुरक्षित घर लौट आते।
इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखें तो एक बड़ा फर्क नजर आता है, लकिन सवाल एक ही है क्या झारखंड वाकई सुरक्षित है?। एक ओर जहां आदिवासी नेता की हत्या के मामले में पुलिस की तरफ से हुई लापरवाही के कारण थाना प्रभारी को सस्पेंड किया गया, वहीं दूसरी ओर दो मासूम बच्चों की गुमशुदगी के मामले में अब तक किसी अधिकारी पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई न ही बच्चों का पता चला। इससे यह साफ दिखता है कि दबाव बनने पर प्रशासन तुरंत कदम उठाती है वरना नहीं। यही बात लोगों को सोचने पर मजबूर कर रही है कि क्या झारखंड में कानून सभी के लिए बराबर है? और क्या आम लोगों की सुरक्षा को उतनी ही अहमियत दी जा रही है? दोनों घटनाओं ने झारखंड में सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है।






