मेरी 20वीं किताब इसी माह प्रकाशित होने जा रही है, जबकि 21वीं की पाण्डुलिपि कल रात ही एक प्रकाशक को सौंपी।
लेकिन मैंने कभी सोचा न था कि इस जीवनकाल में मेरी एक भी किताब छपेगी। मैंने गम्भीर लेखन 2006 में शुरू कर दिया था।
पत्र-पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं छपनी और सराही जाने लगी थीं। लेकिन मेरी पहली किताब 2018 के अंत में जाकर छपी।
यानी मुझे अपनी पहली किताब के लिए 12 साल तक तो इंतज़ार करना ही पड़ा!
उज्जैन में कवि चन्द्रकान्त देवताले के इर्द-गिर्द हम कुछ युवा लेखकों की मण्डली थी। उनमें से बहुतेरे कवि थे।
कविताएँ मैं भी लिखता था, लेकिन उन्हें साहित्य की दृष्टि से स्तरीय नहीं समझा जाता था। उस समय सबकी यह राय थी कि अच्छी कविताएँ लिखना सुशोभित के बस का रोग नहीं, पर अगर वह परिश्रम करे तो अच्छा गद्य अवश्य लिख सकता है।
उसी समय मेरे मित्रों के पहले काव्य-संग्रह छपकर आए। उनकी भूमिकाएँ भी मुझी से लिखवाई गईं। मैंने हँसी-ख़ुशी लिखीं, पर मेरे मन में यह ज़रूर आया कि मेरे सभी साथी-मित्रों की एक-एक किताबें छप गईं, मेरी कब छपेगी?
क्या मैं दूसरों की किताबों की भूमिकाएँ ही लिखता रहूँगा?
मैंने अपनी कविताओं का संग्रह बनाने का प्रयास किया किन्तु कविताओं का शोचनीय स्तर देख ख़ुद ही इस विचार को निरस्त कर दिया।
मैं गद्य पर हाथ साफ़ करने लगा। नियमित एक या दो पन्ना मैं तब गद्य का लिखता था, चाहे किसी भी विषय पर हो। उसे पढ़ने वाला भी कोई न था, आप लिखे ख़ुदा बाँचे का आलम था।
इस तरह मैंने अपनी हस्तलिखित नोटबुकों के सैकड़ों पन्ने रंगे और दुनिया के अनेक विषयों पर कुछ न कुछ पढ़कर कुछ अच्छा गद्यांश लिखने का प्रयास किया।
मैंने पाया कि जहाँ मेरे मित्रों की कविताएँ एकआयामी थीं और समकालीन हिन्दी कविता के प्रचलित मुहावरे में लिखी गई थीं, वहीं गद्य-लेखन बहुआयामी और व्यापक होता है और इसमें लेखक स्वयं को अनेक रूपों में व्यक्त कर सकता है। इससे मेरा आत्मविश्वास धीरे-धीरे बढ़ा।
वर्ष 2009 में पहली बार मैंने गद्य में एक पुस्तक लिखने का निर्णय लिया। उसके लिए मुझे मेरठ के एक प्रकाशक ने अनुबंध-पत्र भी भेज दिया।
वह माइकल जैक्सन के जीवन पर आधारित पुस्तक थी। मैंने उसके 100 से ज़्यादा पन्ने लिख डाले कि तभी मेरा तबादला इन्दौर से भोपाल हो गया और पूरा जीवन अस्त-व्यस्त हो गया।
इस फेर में मेरी लय टूट गई और वह किताब मैं पूरी नहीं कर पाया। उसकी अधूरी पाण्डुलिपि आज भी मेरे पास पड़ी है।
वर्ष 2011 में मैंने फिर एक नया उद्यम शुरू किया और इस बार सत्यजित राय के सिनेमा पर एक किताब लिखने का निश्चय किया।
दो वर्ष के परिश्रम के बाद आखिरकार इसे मैंने पूरा कर लिया। दो प्रकाशक इसे छापने को राज़ी भी हो गए।
लेकिन किताब नहीं छपी तो नहीं छपी। उसका प्रकाशन अभी पिछले वर्ष जाकर ही हो पाया है।
लेकिन आरम्भिक दो विफलताओं के बाद मेरा दिल बैठ गया और मैंने मान लिया कि मेरी कोई किताब कभी नहीं छप सकेगी।
इस दौरान मेरे लेखन में निरंतर मँजाव आता रहा, गद्य में धार आई। 2015 के आसपास मुझे फ़ेसबुक पर लोकप्रियता भी मिलने लगी।
अलबत्ता प्रकाशित पुस्तक के अभाव में मेरा परिचय तब एक ‘फ़ेसबुकिया-लेखक’ के रूप में ही दिया जाता था।
उस समय जब किसी ब्लॉग-पत्रिका आदि में मेरा कोई लेख छपता तो मुझसे पूछा जाता कि लेखक-परिचय में हम क्या लिखें?
तब मैं मन ही मन हताश होकर कहता कि लिख दीजिये, “लेखक कुछ भी नहीं है!” फिर हारकर अपना एक चलताऊ परिचय देता कि “लेखक युवा पत्रकार-अनुवादक है।”
इसमें थोड़ा वज़न डालने के लिए आगे जोड़ देता कि “सत्यजित राय के सिनेमा पर लेखक की पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य है।”
लेकिन यह ‘शीघ्र प्रकाश्य’ वाला मुहावरा भी कितने दिनों तक चलाया जा सकता था? अंतत: उसे भी हटाना पड़ा।
इसी उधेड़बुन में दिन बीत रहे थे। एक युवा कवि मित्र की कविताओं का संकलन मैं तैयार कर रहा था।
संकलन तैयार करके जब मैंने उन्हें सौंपा तो उन्होंने कहा, “तुम भी क्यों नहीं अपना भाग्य आज़माते?
अशोक वाजपेयी इन दिनों कुछ युवा कवियों के संकलन प्रकाशवृत्ति के तहत छाप रहे हैं, शायद तुम्हें भी अवसर दें।”
मैंने मित्र से कहा, “पर मेरे पास अशोक जी का कोई सम्पर्क नहीं है।” मित्र ने मुझे अशोक जी का ईमेल आईडी दिया और कहा- “गुड लक।”
अगस्त 2017 में मैंने अशोक जी को निहायत ही अनौपचारिक शिल्प में एक ईमेल लिखा कि “मैं इन्दौर से सुशोभित हूँ, शायद आपने मेरा नाम सुना हो। मैं लिखता हूँ। क्या आप मेरे लिखे को प्रकाशित करेंगे?”
आश्चर्य कि उनका जवाब आया। उन्होंने कहा, “पीयूष दईया का सम्पर्क दे रहा हूँ, उनसे बात कर लीजिये।”
साथ ही आगे उलाहना दिया कि “हमने रज़ा फ़ाउंडेशन के युवा-2016 के लिए आपको न्योता भेजा था, आप आए क्यों नहीं?”
मैंने विनयपूर्वक उत्तर दिया कि “मैं अत्यंत संकोची स्वभाव का हूँ और सार्वजनिक गोष्ठियों में जाने से कतराता हूँ। आप मुझे क्षमा कीजियेगा।”
मैंने पीयूष दईया को अपनी कविताओं का एक संकलन ‘मलयगिरि का प्रेत’ शीर्षक से बनाकर भेजा।
सौभाग्य से उन्हें मेरी कविताएँ पसंद आईं। वो इसे वाणी प्रकाशन से छापने के लिए राज़ी हो गए।
मेरे लिए तो यह मनमाँगी मुराद थी। अलबत्ता ‘मलयगिरि का प्रेत’ को छपने में भी एक साल से अधिक समय लग गया।
इस अंतराल में मैंने अपनी प्रेम विषयक कविताओं और गद्य की एक और पाण्डुलिपि ‘मैं बनूँगा गुलमोहर’ शीर्षक से तैयार की और उसे एक अन्य मित्र के सिफ़ारिशी-पत्र के साथ लोकोदय प्रकाशन को भेजा।
उन्होंने पाण्डुलिपि स्वीकारी। और इस तरह दूसरी पाण्डुलिपि होने के बावजूद ‘मैं बनूँगा गुलमोहर’, ‘मलयगिरि का प्रेत’ से पहले प्रकाशित हुई।
अक्टूबर 2018 में जब मेरी पहली किताब छपकर मेरे हाथों में आई तो मैं अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पाया। मुझे रोमांच हो आया।
वर्षों पुराना स्वप्न जो साकार हुआ था। संयोग से किताब लोकप्रिय सिद्ध हुई और अमेज़न ने कविता-श्रेणी में उसे ‘बेस्टसेलर’ घोषित कर दिया।
जिस किताब की एक दिन में सौ-डेढ़ सौ प्रतियां बिक जाएँ, उसे अमेज़न किसी न किसी श्रेणी में बेस्टसेलर घोषित कर देता है, लेकिन मैं फूला न समाया।
मैंने अपने ‘बेस्टसेलर’ कवि होने को लेकर बहुत शेख़ी बघारी और बहुत उत्साह से फ़ेसबुक पर अपनी तथाकथित सफलता का उत्सव मनाया।
आज पीछे लौटकर देखने पर वह सब बहुत बचकाना, और लज्जित कर देने वाला लगता है।
किन्तु ‘मैं बनूँगा गुलमोहर’ की लोकप्रियता से इतना अवश्य हुआ कि दूसरे प्रकाशकों को विश्वास आया कि इस लेखक पर पूँजी लगाना घाटे का सौदा नहीं रहेगा।
इस तरह एक-एक कर मेरी आगामी पुस्तकें यश, प्रतिश्रुति और हिन्द युग्म से आईं। मेरी आरम्भिक पाँच-छह पुस्तकों में रचनात्मक प्रतिभा की चमक होने के बावजूद उन्हें मैं अपरिपक्व ही समझता हूँ।
महात्मा गांधी पर लिखी पुस्तक को मैं अपना पहला गम्भीर काम मानता हूँ, जिसने मुझे प्रतिष्ठा दिलाई और आत्मविश्वास से भरा।
विश्वकप फ़ुटबॉल और रजनीश पर लिखी किताबों ने मुझे भीतर से और संतुष्टि दी। रचनात्मक गद्य के मेरे अनेक संग्रह समय-समय पर छपते गए।
हर किताब के साथ मेरा काम बेहतर हुआ लेकिन हर किताब के साथ नई किताब के प्रति मेरा उत्साह भी घटता गया।
अब मेरी कोई पुस्तक आती है तो उसकी सूचना देकर रह जाता हूँ। ‘मैं बनूँगा गुलमोहर’ की आमद पर लेखक ने जैसी दम्भोक्तियों के साथ उत्सव मनाया था, वो अब सुदूर की बात लगती है।
और “इस जीवन में क्या मेरी एक भी किताब छप सकेगी?”- का विषाद तो जैसे पिछले जन्म की कथा!
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