विनीत कुमार
सेंट जेवियर्स, रांची से ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद एमए में हिन्दू कॉलेज में दाख़िला लिया तो कुछ दिनों की जद्दोजहद के बाद मुझे हॉस्टल मिल गया। हॉस्टल में कई तरह की बातें होतीं और कई चीज़ों को लेकर हॉस्टलर्स के बीच क्रेज भी।
एक क्रेज तो यह भी कि आधी रात गए जुबली हॉल के सामने जाकर मिसराईन के परांठें खाना, वी के आर वी राव के सामने अत्तर सिंह के यहां ब्रेड ऑमलेट खाना। और उत्साह की मात्रा बहुत अधिक हो तो गंगा ढ़ाबा, जेएनयू जाकर चाय पीने जाना।
ऐसा करते हुए हमें ऐसे क्लासमेट जो तीन साल से दिल्ली में बिता चुके थे, इसे देश के दूसरे शहर से अलग बताते, सुरक्षा और खुलेपन के प्रतीक के तौर पर इसे स्थापित करते।
मुझे देर रात तक जागना कभी पसंद न आया लेकिन मजबूरी हो तो जागने में कोई समस्या भी नहीं। ये आधी रात गए परांठे खाना, अंडे परांठे खाने माल रोड से घंटाघर जाने में मुझे कुछ भी अजूबा और एडवेंचर की चीज़ नहीं लगी।
दिल्ली के मुक़ाबले रांची छोटा शहर ज़रूर रहा है लेकिन हमने इस शहर में रहते हुए वो सब किया जिसे दिल्ली में साथ के लोग अजूबा बताया करते। आधी रात के ये कारनामे उनमें से एक होते।
तब रांची का एचईसी का पूरा इलाका रात में गुलज़ार रहता। सड़कों के दोनों किनारे लगी लैम्पपोस्ट की रौशनी से नहायी हुई ख़्वाबों की अलग ही दुनिया।
एचईसी, जिसका हैवी इंजीनियरिंग के लिए कभी दुनियाभर में नाम हुआ करता, अपने अवसान की तरफ बढ़ तो रहा था लेकिन ऐसी बहुत सारी चीज़ें बची हुई थीं, जिनकी वजह से दिल्ली आने पर मेरे लिए हैरान करने जैसी कोई बात नहीं लगी।
हम कभी-कभी आधी रात अपने घर से निकलते, सड़कों पर पूरे मौज से चलते, मेरे एकाध-दोस्त के पिता एचईसी में कार्यरत थे तो नाइट स्टे भी कर लेता और घूमते-घूमते सुबह हो जाया करती। भोर के धुंधलके से खौलती चाय से उठती ख़ुशबू और धुआं एक दिलफ़रेब नज़ारा पैदा करते। हमने इन्हीं रातों के बीच, रांची की सड़कों पर से गुज़रते हुए सपने देखे।
मैं अपने उदास दिनों में अक़्सर M.S.Dhoni: The Untold Story(2016) देखने लग जाता हूं। इसकी एक वज़ह तो सुशांत सिंह राजपूत तो हैं ही लेकिन दूसरी वज़ह इस शहर को स्मृतियों के स्तर पर दोहराना भी हुआ करता है।
एम.एस.धोनी ने जिन स्कूल, कॉलेज और संस्थानों की क्रिकेट ग्राऊंड पर चौके-छक्के की लड़ियां तैयार की, मैंने लगभग उन सभी जगहों की ऑडिटोरियम में भाषण और वाद-विवाद प्रतियोगिता में शामिल होकर बोला। इस शहर में रहते हुए सार्वजनिक मंचों से बोलने की तमीज़ और उत्साह पनपा।
फ़िल्म देखते हुए वो जगहें याद आती हैं जहां हम प्रतिभागियों के दिए गए लंच डिब्बे खोलकर बैठ जाया करते। हम यह सब करते हुए नेहरू के सपनों के भारत के बीच होते।
नेहरू ने भारत को लेकर क्या सपने देखे, यह न्यूजरूम की बहस से आप-हम कभी नहीं समझ पाएंगे। समझते हुए महसूस करने का एक तरीका यह है कि आप उन संस्थानों के बीच से गुज़रें जो नेहरू के दौरान या उनकी परिकल्पना के बीच से विकसित हुए।
आप वो वैज्ञानिक दृष्टि, सोच के स्तर पर खुलापन और उस वैविध्य को महसूस कर सकेंगे जो भारत की मूल आत्मा है। कहने को तो यह भारी उत्पादों का निर्माण करनेवाला संस्थान रहा है लेकिन इसके बहाने बसी कॉलेनियों से तबले, गिटार, घुंघरू, थाप और संगीत के स्वर विस्तार पाते, साहित्यिक रसिकों की पूरी-पूरी एक दुनिया हुआ करती।
यह अलग बात है कि अब इसी की तरह कई दूसरे संस्थान और उनके परिसर नेहरू के सपनों के खंडहर में तब्दील हो गए हैं, कर दिए गए हैं। एक संस्थान जिसने देश और दुनिया के हजारों प्रतिभशाली लोगों को पनाह दिया, अब उसके होने- न होने के बीच का फर्क़ जैसे बचा ही न हो।
तस्वीर में जो इमारतें हैं वो एचईसी में कार्यरत अधिकारियों के हुआ करती थी। तब इनकी बनावट के साथ-साथ रंगों को लेकर एकरूपता होती।
अब अपनी-अपनी पसंद के नाम पर कुरुचि का लापरवाह नमूना है। जो इमारत या तल बदरंग हो गए हैं, समझिए वो अभी भी एचईसी के अधीन हैं। बाक़ी लीज पर उठ गए हैं और लोगों की हैसियत और पसंद के हिसाब से जिन पर रंग चढ़ गए हैं।
मैं आपसे सच कहूं, एचईसी इलाके से गुज़रते हुए मैं भीतर से एकदम कलप उठता हूं, जिस अंदाज़ में दुनिया के शानदार इस संगठन का क्षरण हुआ है, वो एकदम साफ़ नज़र आता है।
नेहरू के ढहते हुए स्वप्न का एक नमूना. यह सड़क बायीं तरफ मुड़ती है और धोनी के पुराने घर की तरफ जाती है। अब वो वहां नहीं रहते. मैं सड़क के दाहिनी ओर मुड़ता हूं, मेरी मां के शहर की सड़क इसी ओर से गुज़रती है।
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