Hemant Soren
झारखंड की राजनीति में इन दिनों जो हलचल दिखाई दे रही है, वह महज़ दल-बदल की सामान्य घटना नहीं है। यह संकेत है एक बड़े वोटिंग पैटर्न शिफ्ट का—खासतौर पर शहरी और ओबीसी मतदाताओं के स्तर पर। चुनाव भले तत्काल न हों, लेकिन नगर निकाय चुनावों की पृष्ठभूमि में यह हलचल आने वाले वर्षों की राजनीति की दिशा तय कर सकती है।
भारतीय जनता पार्टी से दो अहम चेहरों का अचानक झारखंड मुक्ति मोर्चा में शामिल होना इसी बदलाव की ओर इशारा करता है। पहला नाम चंद्रशेखर अग्रवाल का है, जिन्होंने दुमका जाकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मौजूदगी में पार्टी की सदस्यता ली। यह अपने-आप में एक राजनीतिक संदेश था, लेकिन असली सियासी असर दूसरे नाम से जुड़ा है—शालिनी गुप्ता।
शालिनी गुप्ता की एंट्री: साधारण दल-बदल नहीं
शालिनी गुप्ता की झामुमो में एंट्री को सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम मानना भूल होगी। उनकी अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि मुख्यमंत्री स्वयं कोडरमा पहुंचे और उन्हें पार्टी में शामिल कराया। शालिनी गुप्ता कोई नया या उभरता हुआ चेहरा नहीं हैं। वे कोडरमा जिला परिषद की अध्यक्ष रह चुकी हैं और 2019 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट की सबसे मजबूत दावेदारों में गिनी जाती थीं।
टिकट नहीं मिला और यहीं से उनके राजनीतिक रास्ते ने अलग मोड़ लिया। उन्होंने आजसू के टिकट पर चुनाव लड़ा और तीसरे स्थान पर रहीं। लेकिन असली राजनीतिक संदेश 2024 के लोकसभा चुनाव में सामने आया, जब उन्हें 69,537 वोट मिले। यह संख्या केवल व्यक्तिगत समर्थन नहीं दर्शाती, बल्कि पूरे कोडरमा क्षेत्र के चुनावी गणित को प्रभावित करने वाली थी।
राजद उम्मीदवार सुभाष यादव की हार का अंतर मात्र 5,815 वोट रहा। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यदि शालिनी गुप्ता इतने बड़े पैमाने पर वोट नहीं काटतीं, तो परिणाम अलग हो सकता था। इसका अर्थ साफ है—उनका प्रभाव केवल एनडीए वोट तक सीमित नहीं था, बल्कि राजद के पारंपरिक वोट बैंक में भी सीधी सेंध पड़ी।
कोडरमा: झामुमो की रणनीति का प्रवेश द्वार
कोडरमा को यूं ही ‘गेटवे ऑफ झारखंड’ नहीं कहा जाता। यहां का राजनीतिक मिजाज बिहार से मेल खाता है और लंबे समय से झामुमो इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करता रहा है। शालिनी गुप्ता की एंट्री इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है—एक ऐसा चेहरा, जो शहरी, ओबीसी और वैश्य समाज में प्रभाव रखता है।
अब अगर तस्वीर को जोड़ें, तो चंद्रशेखर अग्रवाल और शालिनी गुप्ता—इन दोनों को साथ लाकर झामुमो ने एक नहीं, दो सियासी दांव खेले हैं। पहला दांव शहरी वोट पर और दूसरा ओबीसी, खासकर वैश्य समुदाय पर।
बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक में दरार?
वैश्य समुदाय को लंबे समय से बीजेपी का मजबूत आधार माना जाता रहा है। लेकिन, इन दोनों नेताओं का झामुमो में जाना इस ओर संकेत करता है कि इस वर्ग में भी असंतोष पनप रहा है। पिछले दो विधानसभा चुनावों में बीजेपी के भीतर उम्मीदवार चयन, कथित परिवारवाद, पैसे के लेन-देन और चहेतों को टिकट देने जैसे आरोप लगातार चर्चा में रहे हैं।
ऐसे माहौल में शालिनी गुप्ता जैसे जनाधार वाले नेता और चंद्रशेखर अग्रवाल जैसे संगठनात्मक चेहरों को बीजेपी में भविष्य सीमित दिखना अस्वाभाविक नहीं है। चूंकि अगला विधानसभा चुनाव अभी चार साल दूर है, इसलिए सत्ता पक्ष से जुड़ना उनके लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद भी है—और झामुमो के लिए शहरी इलाकों में पैठ बनाने का अवसर।
शहरी-ओबीसी रणनीति और नगर निकाय चुनाव
आदिवासी वोट बैंक पर झामुमो की पकड़ पहले से मजबूत मानी जाती है। अब पार्टी की नजर स्पष्ट रूप से ओबीसी और शहरी मतदाताओं पर है। इसका संकेत मुख्यमंत्री पहले ही धनबाद में दे चुके हैं, जब उन्होंने कहा था—“गांव भी हमारा है, और शहर भी हमारा।” यह बयान बाहरी-भीतरी की राजनीति से आगे बढ़कर शहरी वर्ग से सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखा गया।
नगर निगम चुनाव नजदीक हैं और झामुमो लगातार शहरी वोटों को साधने की कोशिश कर रहा है। कोडरमा में 5 फरवरी को शालिनी गुप्ता को पार्टी में शामिल कराते हुए मुख्यमंत्री का यह कहना कि “अब सरकार को दो आंखें और मिल गई हैं”, केवल औपचारिक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि राजनीतिक संकेत भी था।
आगे का सवाल
अब सवाल यह नहीं है कि झामुमो ने दांव चला है या नहीं—दांव तो चल चुका है। असली सवाल यह है कि क्या यह नई शहरी और ओबीसी रणनीति नगर निकाय चुनावों के नतीजों में दिखाई देगी? या फिर भारतीय जनता पार्टी इस चुनौती का कोई नया राजनीतिक जवाब तैयार कर पाएगी?
राजनीति की बिसात बिछ चुकी है। अब यह देखना बाकी है कि कौन-सी चाल मतपेटी तक असर छोड़ती है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

















