BJP+JMM alliance:
रांची। झारखंड की राजनीतिक फिजा में चर्चाओं का शोर है, जो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के दिल्ली से लौटने के बाद भी दबा नहीं है। अब कयास ये लगाये जा रहे हैं कि हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन की बीजेपी के शीर्ष नेताओं से बातचीत हो चुकी है और आगे की प्रक्रिया जारी है। ये प्रक्रिया क्या है, अब इसे समझने की कोशिश की जा रही है।
दरअसल, दोनों ही दलों को अपने नेताओं को भरोसे में लेना और सबकी सहमति पाना बड़ी चुनौती है। और यह झारखंड मुक्ति मोर्चा से ज्यादा भारतीय जनता पार्टी के लिए मुश्किल होनेवाला लग रहा है। हेमंत सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के निर्विवाद नेता हैं। हालांकि पिता शिबू सोरेन के गुजरने के बाद उन्हें अपने घर-परिवार को भी साथ लेकर चलना है। इसके अलावा पार्टी के सीनियर नेताओं को साथ करना है, जो ज्यादा मुश्किल नहीं होनेवाला क्योंकि सभी राज्य और पार्टी की स्थिति को भली भांति समझ रहे हैं। उन्हें पता है कि राज्य को चलाने के लिए क्या बेहतर है।
पार्टी और सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाओं को सुचारू ढंग से चलाने की क्या अहमियत है। वैसे भी पार्टी में युवा नेताओं की संख्या बढ़ी है, जो हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन के प्रति समर्पित हैं। भले ही यहां राज्य में वे नारे लगा रहे हों कि झारखंड झूकेगा नहीं, परंतु उन्हें भी पता है कि असलियत में क्या स्थिति है। इतना ही नहीं, वे ये भी जानते हैं कि कांग्रेस के साथ लंबी रेस का घोड़ा बनकर फिलहाल कुछ खास हासिल नहीं होनेवाला है। इसके साथ ही, राजद और कांग्रेस द्वारा बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान सीटों को लेकर की गई पैतरेबाजी को भा अब तक झामुमो भूला नहीं है। इससे झामुमो के नेताओं के अंदर खलबली मची है और बिहार चुनाव में कांग्रेस तथा राजद के प्रदर्शन ने महागठबंधन में इनके बीच दूरियां बढ़ा दी है।
अब बात भारतीय जनता पार्टी की, तो इसे अपने नेताओं को इस नये गठबंधन के लिए सहमत करना आसान नहीं है। क्योंकि, पार्टी में चार-चार पूर्व मुख्यमंत्री हैं, जिनका राजनीतिक करियर इस फैसले से मुश्किल में पड़ सकता है। ये नेता हैं झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल मरांडी, दूसरे मुख्यमंत्री रहे अर्जुन मुंडा, झारखंड में पूरे पांच साल लगातार सरकार चलानेवाले रघुवर दास और झारखंड मुक्ति मोर्चा के रहते हुए मुख्यमंत्री रहे चंपाई सोरेन। ये सभी बड़े नाम हैं। बाबूलाल मरांडी तो अभी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं और झारखंड विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष भी।
इन सभी महत्वकांछा किसी से छुपी भी नहीं है। इधर, जाहिर सी बात है कि यदि समझौता हुआ, तो झारखंड मुक्ति मोर्चा मुख्यमंत्री का पद छोड़ेगा नहीं। मुख्यमंत्री तो हेमंत सोरेन या कल्पना सोरेन ही रहेंगे, यदि दोनों में से किसी एक को केंद्र में सीट मिली तो। बीजेपी भी सिर्फ बाहर से समर्थन देने की रणनीति से बचेगी। वह सरकार में शामिल होना चाहेगी, ताकि जनता के बीच अपने काम से ज्यादा जगह बना सके और बिहार की तरह बेहतर ढंग से गठबंधन को चला सके।
ऐसे में चर्चा है कि बीजेपी को उप मुख्यमंत्री का पद मिल सकता है। अब यदि हेमंत सोरेन या कल्पना सोरेन मुख्यमंत्री रहें, तो बीजेपी के ये सीनियर नेता, जो पहले मुख्यमंत्री रह चुके हैं, उनके नीचे उप मुख्यमंत्री का पद कैसे संभालेंगे। ऐसे में बीजेपी कोई नया चेहरा आगे कर सकती है। यदि वह नया चेहरा ज्यादा स्मार्ट हुआ, तो आनेवाले दिनों में बीजेपी का फेस भी बन सकता है। और यदि कोई नया नेता बीजेपी को मिला, जो पार्टी को आगे बढ़ा सके, तो इन चार सीनियर नेताओं का क्या होगा। इनका तो पूरा राजनीतिक करियर ही दांव पर लग सकता है। संभवतः यही कारण है कि इन सभी को सहमत करना और इनका भरोसा जीतना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा।
बता दें कि बीते दिनों जब हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन दिल्ली गये थे, तो अगले ही दिन बाबूलाल मरांडी भी दिल्ली में थे। अब वह दिल्ली में क्यों थे, उन्होंने बीजेपी के शीर्ष नेताओं से क्या बात की और उन्हें क्या समझाया ये तो वही बता सकते हैं, लेकिन कयास लगाये जा रहे हैं कि उन्होंने पार्टी के शीर्ष नेताओं से सोच समझ कर कोई भी निर्णय लेने का आग्रह किया है। साथ ही उन्होंने याद दिलाया है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा पर पूरी तरह भरोसा करना उचित नहीं होगा। पहले के अनुभवों की भी उन्होंने चर्चा की है, जब झामुमो और बीजेपी में अलगाव हुआ था। अब तक की चुप्पी ये इशारा भी कर रही है कि बाबूलाल की बात गंभीरता से सुनी गई है और रणनीति बन रही है कि यदि समझौता होता है, तो फिर ऐसी नौबत न आये।
इधर, बीजेपी दूसरे सीनियर लीडर्स अर्जुन मुंडा और चंपाई सोरेन भी बयान दे रहे हैं कि दोनों दलों के बीच समझौते जैसी कोई बात नहीं है। यह सब सिर्फ कांग्रेस द्वारा उड़ाई गई हवा है। वैसे भी चंपाई सोरेन स्थिति सबसे ज्यादा मुश्किल में होगी, क्योंकि एक साल पहले ही वह झारखंड मुक्ति मोर्चा को छोड़ कर बीजेपी में शामिल हुए थे। यदि अब झामुमो और बीजेपी एक मंच पर आते हैं, तो उनकी स्थिति क्या होगी, इसकी तो सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। उधर, रघुवर दास, जिन्होंने झारखंड की राजनीति के लिए ओड़ीसा के राज्यपाल का पद त्याग दिया, उनके तो तमाम मंसूबों पर पानी ही फिर जायेगा। वहीं,, अर्जुन मुंडा की बात करें, तो केंद्र की राजनीति उन्हें भा रही है, लेकिन इसके लिए उन्हें झारखंड में भी पैर मजबूती से जमाये रखना जरूरी होगा। क्योंकि, राजनीति सिर्फ हवा में उड़कर नहीं की जा सकती।
इधर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा दो दिनों से झारखंड में हैं। कहने को तो वह संगठन की मजबूती और विस्तार को लेकर प्रदेश के नेताओं संग बैठक तथा चर्चा कर रहे हैं। पर अंदरूनी खबर ये भी है कि वे पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को झामुमो के साथ समझौते को लेकर टटोल भी रहे हैं। ये जरूरी भी है, ताकि यदि दोनों दल एक मंच पर आयें, तो किसी में असंतोष न हो। साथ ही, ये भी आकलन किया जा रहा है कि समझौते की स्थिति में इन चारो वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी का पार्टी में क्या असर पड़ सकता है। गुटबाजी को हवा तो नहीं मिलेगी और कौन किसके साथ है। इसलिए नड्डा की झारखंड में हो रही ये बैठक काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
नोटः लेखक आइडीटीवी इंद्रधनुष के संपादक हैं…

