निकाय चुनावः बीजेपी बनाम हेमंत, जयराम एक्स फैक्टर- आनंद कुमार

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Jharkhand municipal elections

Jharkhand में नगर निकाय चुनाव की घोषणा के साथ ही राजनीतिक माहौल अचानक गर्म हो गया है। 29 जनवरी से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और 27 फरवरी को मतगणना के साथ यह साफ हो जाएगा कि शहरी झारखंड की राजनीतिक नब्ज आखिर किसके हाथ जाती है। महज एक महीने से भी कम समय में यह चुनाव राज्य की शहरी राजनीति की दिशा और दशा तय कर देगा।

चुनाव की घोषणा के साथ ही सियासी हलकों में तीन बड़े सवाल केंद्र में आ गए हैं—

क्या INDIA गठबंधन शहरी इलाकों में अपनी ठोस मौजूदगी दर्ज करा पाएगा?
क्या Bharatiya Janata Party शहरी क्षेत्रों में अपना पुराना वर्चस्व बनाए रखेगी?
या फिर जयराम महतो शहरी राजनीति में कोई नया और असरदार समीकरण खड़ा कर देंगे?

क्यों अहम हैं ये सवाल

अगर झारखंड के नौ प्रमुख नगर निगम क्षेत्रों—रांची, हजारीबाग, धनबाद, चास, गिरिडीह, आदित्यपुर, मानगो, डाल्टनगंज और देवघर—पर नजर डालें, तो अब तक आम धारणा यही रही है कि शहरी इलाकों में भाजपा की पकड़ मजबूत रही है। पिछले कई चुनावों में नगर निगम क्षेत्रों में भाजपा समर्थित उम्मीदवारों की जीत ने इस धारणा को और पुख्ता किया है।

इसी वजह से इस बार सबसे बड़ी चुनौती सत्तारूढ़ गठबंधन के सामने खड़ी है—क्या मुख्यमंत्री Hemant Soren इस शहरी किले में सेंध लगा पाएंगे? और क्या जयराम महतो इस स्थापित गणित को बिगाड़ने में सफल होंगे?

गैर-दलीय चुनाव, लेकिन राजनीति पूरी तरह दलीय

हालांकि यह चुनाव गैर-दलीय आधार पर हो रहा है, लेकिन सियासी दलों की सक्रियता किसी से छिपी नहीं है। अगर चुनाव पार्टी चिन्ह पर होते, तो नौ नगर निगम, 20 नगर परिषद और 19 नगर पंचायतों में अध्यक्ष पद को लेकर सीटों का बंटवारा तय करना आसान होता। लेकिन गैर-दलीय चुनाव में ऐसा संभव नहीं है।

ऐसे में असली लड़ाई अब प्रत्याशियों के स्तर पर होगी—कौन किसके साथ तालमेल बैठा पाता है, किसे किसका समर्थन मिलता है और कहां वोटों का बिखराव होता है, यही नतीजों की दिशा तय करेगा।

NDA की स्थिति अपेक्षाकृत साफ

NDA की बात करें तो झारखंड में उसके घटक दलों की स्थिति तुलनात्मक रूप से स्पष्ट दिखाई देती है। आजसू पार्टी, जदयू और लोजपा जैसे दल NDA के साथ हैं।

मानगो नगर निगम क्षेत्र जमशेदपुर पश्चिम विधानसभा के अंतर्गत आता है, जहां जदयू विधायक सरयू राय का प्रभाव माना जाता है। ऐसे में वहां जदयू की दावेदारी स्वाभाविक मानी जा रही है। अब देखना यह होगा कि भाजपा इस समीकरण में किस तरह संतुलन बनाती है।

आजसू पार्टी के लिए विकल्प सीमित नजर आते हैं। गिरिडीह एकमात्र ऐसा नगर निगम क्षेत्र है, जहां आजसू सांसद चंद्र प्रकाश चौधरी की मौजूदगी के कारण पार्टी का दावा मजबूत माना जा रहा है। हालांकि वहां साझा सहमति बन पाएगी या नहीं, यह अब भी खुला सवाल है।

रांची, हजारीबाग, देवघर, डाल्टनगंज, धनबाद और चास जैसे बड़े नगर निगम क्षेत्रों में भाजपा सांसदों की लगातार जीत इस बात का संकेत है कि इन इलाकों में पार्टी की जड़ें अभी भी गहरी हैं।

INDIA गठबंधन के सामने अंदरूनी तालमेल की चुनौती

दूसरी ओर INDIA गठबंधन के लिए यह चुनाव आसान नहीं है। पिछले निकाय चुनावों में रांची, हजारीबाग, देवघर, गिरिडीह, धनबाद, चास और मेदिनी नगर जैसे क्षेत्रों में भाजपा समर्थित उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी। भले ही चुनाव गैर-दलीय थे, लेकिन राजनीतिक लाभ भाजपा को ही मिला।

इस बार भी गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती भीतर की खींचतान को संभालना है—कौन कहां से उम्मीदवार देगा, किसे समर्थन मिलेगा और कहां समझौता होगा।

विदेश यात्रा से पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने आवास पर झामुमो कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर साफ संकेत दिया कि पार्टी इस चुनाव को हल्के में लेने के मूड में नहीं है। झामुमो का आकलन है कि पिछले विधानसभा चुनावों में शहरी इलाकों में भाजपा को कई जगह कड़ी टक्कर मिली थी, जिससे यह भरोसा बढ़ा है कि शहरी समीकरण बदले जा सकते हैं।

जयराम महतो बने एक्स-फैक्टर

इस पूरे चुनावी परिदृश्य में जयराम महतो एक अहम फैक्टर बनकर उभरे हैं। गिरिडीह, धनबाद, चास और हजारीबाग के कुर्मी बहुल इलाकों में उनकी पकड़ कितनी असरदार होगी, इस पर राजनीतिक नजरें टिकी हैं। विधानसभा चुनाव में भले ही उनकी पार्टी को एक ही सीट मिली हो, लेकिन वोट शेयर के लिहाज से वह राज्य की चौथी बड़ी ताकत बनकर उभरी थी।

फैसला शहर करेंगे

कुर्मी और आदिवासी मतदाताओं का रुझान, शहरी मतदाताओं की नाराजगी, भाजपा का संगठनात्मक दबाव और हेमंत सोरेन के लिए शहरी इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर—ये सभी पहलू इस निकाय चुनाव को बेहद अहम बना रहे हैं।

अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या INDIA गठबंधन शहरी इलाकों में भी वही असर दिखा पाएगा, जो उसने विधानसभा चुनाव में दिखाया था, या फिर भाजपा एक बार फिर नगर निकायों में अपना दबदबा कायम रखने में सफल होगी।
आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि झारखंड की शहरी राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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