आशापूर्णा देवी, बांग्ला भाषा की कवयित्री और एक उपन्यासकार थीं। उन्होंने 13 साल की उम्र से लिखना शुरू किया और आजीवन साहित्य रचना से जुड़ी रहीं। आशापूर्णा देवी का जन्म आठ जनवरी 1909 को बंगाल प्रांत के उत्तरी कलकत्ता में हुआ था। उनके पिता का नाम हरेंद्रनाथ गुप्त भी एक कलाकार थे। माता सरोला सुंदरी एक शिक्षित परिवार से थीं।
आशापूर्णा का बचपन वृंदावन बसु गली में बीता। यहां पर परंपरागत और रूढ़िवादी परिवार रहते थे। उनकी दादी की चलती थी, जो पुराने रीति-रिवाजों और रूढ़िवादी आदर्शों की कट्टर समर्थक थीं। यही नहीं उस समय घर की लड़कियों को स्कूल तक जाना मना था और लड़कों को पढ़ाने के लिए भी घर पर ही शिक्षक आते थे। जब आशापूर्णा देवी बच्ची थीं, तब अपने भाइयों के पढ़ने के दौरान वह भी उसे सुनती थीं। इस प्रकार उन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा ग्रहण की। बाद में उनके पिता अपने परिवार के साथ दूसरी जगह चले गए।
यहां उनकी पत्नी और बेटियों को स्वतंत्र माहौल मिला। उन्हें पुस्तकें पढ़ने का भी मौका मिला। आशापूर्णा के पास कोई औपचारिक शिक्षा नहीं थी, लेकिन वह स्व-शिक्षित थीं। आशापूर्णा बचपन में अपनी बहनों के साथ कविताएं लिखती थीं। आशापूर्णा ने अपनी एक कविता ‘बाइरेर डाक’, ‘शिशु साथी’ के संपादक राजकुमार चक्रवर्ती को वर्ष 1922 में चोरी-चुपके प्रकाशित करने के लिए दी।
इसके बाद संपादक ने उनसे और कविताएं और कहानियां लिखने का अनुरोध किया। यहीं से उनका साहित्यिक लेखन शुरू हो गया था। 1976 में आशापूर्णा देवी को प्रथम प्रतिश्रुति के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने इन्हें पद्मश्री से भी नवाजा।
आशापूर्णा देवी की कहानियां स्त्रियों पर किए गए उत्पीड़न को उधेड़ती और एक नई सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करने की अपील करती हैं। उनकी तीन प्रमुख कृतियां- प्रथम प्रतिश्रुति, सुवर्णलता और कबुल कथा समान अधिकार हासिल करने के लिए महिलाओं के अनंत संघर्ष की कहानियां हैं।








