Winter sleep cycle science
नई दिल्ली, एजेंसियां। सर्दियों का मौसम आते ही ज्यादातर लोग महसूस करते हैं कि नींद कुछ ज्यादा ही आने लगी है। सुबह जल्दी उठना मुश्किल लगता है, रजाई छोड़ने का मन नहीं करता और दिनभर हल्की सुस्ती बनी रहती है। आमतौर पर लोग इसे आलस मान लेते हैं, लेकिन इसके पीछे शरीर की एक वैज्ञानिक और प्राकृतिक प्रक्रिया काम करती है। मौसम बदलने के साथ हमारे शरीर की बायोलॉजिकल घड़ी यानी स्लीप साइकिल भी बदल जाती है।
सर्दियों में दिन छोटे और रातें लंबी हो जाती हैं
सूरज देर से निकलता है और जल्दी ढल जाता है, जिससे शरीर को कम प्राकृतिक रोशनी मिलती है। इसका सीधा असर मेलाटोनिन हार्मोन पर पड़ता है। मेलाटोनिन वही हार्मोन है जो दिमाग को सोने का संकेत देता है। अंधेरा बढ़ने पर इसका स्तर बढ़ जाता है, जिससे नींद जल्दी और ज्यादा आने लगती है।इसके साथ ही धूप कम मिलने के कारण सेरोटोनिन हार्मोन का स्तर भी घट जाता है। सेरोटोनिन मूड, ऊर्जा और एक्टिवनेस से जुड़ा होता है। इसका लेवल कम होने पर सुस्ती, थकान और नींद की इच्छा बढ़ना स्वाभाविक है। यही वजह है कि सर्दियों में लोग ज्यादा समय बिस्तर में बिताना चाहते हैं।
अक्सर यह सवाल उठता है
अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या सर्दियों में ज्यादा नींद आना आलस है? जवाब है नहीं। ठंड के मौसम में शरीर का मेटाबॉलिज्म थोड़ा धीमा हो जाता है। शरीर खुद को गर्म रखने के लिए ऊर्जा बचाने की कोशिश करता है, जिसके चलते एक्टिविटी कम और नींद का समय बढ़ जाता है। यह शरीर की सुरक्षा और संतुलन बनाए रखने की प्रक्रिया है।
हमारे शरीर की आंतरिक घड़ी, जिसे सीजनल बायोलॉजिकल रिदम कहा जाता है, मौसम के अनुसार खुद को ढाल लेती है। सर्दियों में यह रिदम धीमी हो जाती है, जिससे नींद गहरी और लंबी होती है, जबकि गर्मियों में दिन लंबे होने के कारण नींद की जरूरत कम महसूस होती है। यानी ठंड में ज्यादा नींद आना पूरी तरह नेचुरल है, न कि आलस।

