ISRO launch:
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की सभी बड़ी और छोटी रॉकेट लॉन्चिंग ज्यादातर श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) और बालासोर (ओडिशा) से होती हैं। ये दोनों स्थान ISRO के अंतरिक्ष कार्यक्रम की सफलता के पीछे भूगोलिक और तकनीकी कारणों से खास हैं।
श्रीहरिकोटा ISRO का प्रमुख स्पेसपोर्ट
श्रीहरिकोटा में स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से भारत के बड़े मिशन जैसे चंद्रयान, मंगलयान और आदित्य-एल1 लॉन्च किए गए हैं। इसका स्थान भूमध्य रेखा के करीब है, जहां पृथ्वी की घूमने की गति सबसे अधिक होती है। इससे रॉकेट को अतिरिक्त गति मिलती है, जिससे ईंधन की बचत होती है और पेलोड क्षमता बढ़ती है। इसके अलावा, श्रीहरिकोटा एक द्वीप पर है, जो रॉकेट उड़ान के दौरान दुर्घटना की स्थिति में आबादी वाले इलाकों को सुरक्षित रखता है।
श्रीहरिकोटा में दो मुख्य लॉन्च पैड हैं:
फर्स्ट लॉन्च पैड (FLP): छोटे और मझोले मिशनों के लिए (PSLV, SSLV)।
सेकेंड लॉन्च पैड (SLP): भारी रॉकेट्स के लिए (GSLV, LVM3)।
तीसरे बड़े लॉन्च पैड की योजना भी है, जो भारत के बड़े मिशनों के लिए सहायक होगा।
बालासोर छोटे रॉकेट्स के लिए आदर्श जगह
बालासोर लॉन्चिंग स्टेशन मुख्य रूप से साउंडिंग रॉकेट्स और छोटे वैज्ञानिक मिशनों के लिए प्रयोग होता है। यह भी समुद्र के किनारे है, जो उड़ान पथ को सुरक्षित बनाता है। बालासोर कम व्यस्त होने की वजह से छोटे मिशनों के लिए सुविधाजनक विकल्प है।
लॉन्चिंग के लिए इन स्थानों की खासियत:
पूर्वी तट और भूमध्य रेखा के पास: रॉकेट को अधिक रोटेशनल गति मिलती है।
समुद्र के किनारे: दुर्घटना की स्थिति में रॉकेट के अवशेष समुद्र में गिरते हैं, जिससे जनजीवन सुरक्षित रहता है।
मौसम और बुनियादी ढांचा: बेहतर मौसम और अत्याधुनिक सुविधाएं।
सुरक्षा: आबादी से दूर लॉन्चिंग, जिससे खतरे कम होते हैं।
भविष्य की योजनाएं:
ISRO ने तमिलनाडु के कुलासेकरपट्टिनम में भी नया स्पेसपोर्ट विकसित करने की योजना बनाई है ताकि पोलर ऑर्बिट मिशनों के दौरान रॉकेट को फ्यूल बचाने वाला मार्ग मिल सके। इस तरह, श्रीहरिकोटा और बालासोर ISRO के लिए रणनीतिक, सुरक्षित और तकनीकी रूप से उपयुक्त स्थान हैं, जो भारत के अंतरिक्ष अभियानों की सफलता की नींव हैं।
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