Gorakhnath temple: गोरखनाथ मंदिर में श्रद्धांजलि सप्ताह का समापन कल, CM योगी समेत कई संतजन रहेंगे मौजूद

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Gorakhnath temple:

अयोध्या, एजेंसियां। प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर स्थित गोरखनाथ मंदिर में गुरुवार (11 सितंबर) को श्रद्धांजलि सप्ताह का समापन होगा। यह सप्ताह ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 56वीं और महंत अवेद्यनाथ की 11वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित किया गया। समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित कई संतजन और सामाजिक हस्तियां शामिल होंगी।

Gorakhnath temple: महंत अवेद्यनाथ का जीवन और योगदान

महंत अवेद्यनाथ का जन्म 18 मई 1919 को उत्तराखंड के गढ़वाल जिले में हुआ था। बचपन से ही धर्म और अध्यात्म में रुचि रखने वाले महंतजी ने 1942 में गोरक्षपीठ में दीक्षा ली और 1969 में महंत दिग्विजयनाथ की चिर समाधि के बाद गोरखनाथ मंदिर के पीठाधीश्वर बने। योग और दर्शन के मर्मज्ञ महंत अवेद्यनाथ ने नाथपंथ की लोक कल्याणकारी परंपरा को आगे बढ़ाया और सामाजिक समरसता के आदर्श स्थापित किए।

Gorakhnath temple: राम मंदिर आंदोलन में निर्णायक भूमिका

1990 के दशक में महंत अवेद्यनाथ ने श्रीराम मंदिर आंदोलन को निर्णायक मोड़ पर पहुंचाया। उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति और श्रीराम जन्मभूमि निर्माण उच्चाधिकार समिति के अध्यक्ष के रूप में आंदोलन में संतों, राजनीतिज्ञों और आमजन को एकसूत्र में बांधा। उनके नेतृत्व में मंदिर निर्माण की प्रक्रिया सफल हुई और 5 सदी के लंबे इंतजार के बाद श्रीराम मंदिर का निर्माण शुरू हुआ।

Gorakhnath temple: सामाजिक समरसता और दलित सशक्तिकरण

महंत अवेद्यनाथ ने जातिगत भेदभाव और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अभियान चलाया। दलित बस्तियों में सहभोज अभियान शुरू कर सभी वर्गों को एक पंगत में भोजन कराया और सामाजिक समरसता का संदेश फैलाया। उन्होंने प्रभु श्रीराम और देवी दुर्गा के उद्धरणों के माध्यम से लोगों में सामूहिक चेतना और एकता का संदेश दिया।

Gorakhnath temple: राजनीतिक योगदान:

धर्म और समाज सेवा के साथ महंत अवेद्यनाथ ने राजनीति में भी अनूठा योगदान दिया। उन्होंने पांच बार मानीराम विधानसभा और चार बार गोरखपुर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा में उपाध्यक्ष और महासचिव के पद पर रहते हुए उन्होंने समाज और धर्म के संगम को मजबूती दी।

श्रद्धांजलि सप्ताह का समापन महंत अवेद्यनाथ की शिक्षाओं, जीवन और आदर्शों को याद करते हुए किया जाएगा, जिसमें सामाजिक समरसता और धार्मिक एकता पर विशेष जोर रहेगा।

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