जब जब फ़िल्मी सितारों की नाक़ाम प्रेम कहानियों का इतिहास लिखा जाएगा तो सुरैया-देवानंद की प्रेम-कहानी का ज़िक्र ज़रूर होगा। सुरैया परदे की ही नहीं असल दुनिया में भी रानी थी। बेहद खूबसूरत. उस दौर की सबसे महंगी स्टार. तीन-तीन ख़िताब उनके नाम रहे – मलिका-ए-हुस्न, मलिका-ए-तरन्नुम और मलिका-ए-अदाकारी।
एक्ट्रेस वीना का भाई तो उससे ब्याह करने भूख हड़ताल पर बैठ गया. एक प्रेमी तो लाहोर से दहेज़ के साथ बारात ही लेकर आ गया। कई तस्वीर रख कर पूजा किया करते थे। सुना गया कि मोरारजी देसाई के पुत्र कांति देसाई ने उन्हें डिनर पर बुलाया था, लेकिन सुरैया ने इंकार कर दिया।
धर्मेंद्र ने किशोरावस्था में उनकी फिल्म ‘दिल्लगी’ चालीस मरतबे देखी। प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने जब उनकी ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ देखी तो ख़ुद को यह कहने से रोक नहीं पाए – आपने मिर्ज़ा ग़ालिब की रूह को ज़िंदा कर दिया।
प्रोफेशन में सुरैया देवानंद से सीनियर थीं और पहली ही फिल्म से दोनों एक-दूसरे को दिल दे बैठे। ‘विद्या’ इनकी पहली फिल्म रही। सुरैया स्टूडियो में शूट कर रही थीं। उन्होंने गौर किया कि एक खूबसूरत नौजवान एक कोने में बैठा उन्हें घूर रहा है। उसका अंदाज़ कुछ रोमांटिक था।
सुरैया असहज हो गयी। शुरू में उन्होंने उपेक्षा की. ऐसे तो रोज़ सैकड़ों लोग घूरते हैं। किस किस की परवाह करूं? लेकिन वो फिर भी उस पर से नज़र हटा नहीं सकीं। बहुत कशिश थी उस चेहरे में। आख़िरकार सुरैया ने डायरेक्टर से पूछा – कौन है वो जो उस कोने में बैठा मुझे बेतरह घूर रहा है?
तब डायरेक्टर ने उस नौजवान से मिलाया – यह आपका नया हीरो है. कुछ ही फिल्मों में काम किया है। आप को घूर इसलिए रहा है ताकि आपके हाव-भाव से वो खुद को एडजस्ट कर सके। उन दोनों का पहला ही शॉट रोमांटिक था। नए होने के बावजूद देव बहुत खूबसूरती से कर ले गए।
इधर सुरैया देव को दिल दे बैठीं. उन्हें लगा कि सपनों के जिस शहज़ादे का उन्हें बड़ी शिद्दत से एक मुद्द्त से इंतज़ार था वो मिल गया है। उन्होंने देव से कहा कि तुम्हें मैं स्टीव कहूंगी। देव ने कहा – तुम मेरी नोज़ी हो, लंबी नाक वाली। सुरैया ने एक और निक-नेम भी दिया – देवीना. कालांतर में सुरैया की याद में देव ने अपनी बेटी का नाम देवीना रखा।
बताया जाता है कि सुरैया का प्रिय हीरो हॉलीवुड का सुपर स्टार ग्रेगरी पैक था. वो उससे मिलीं भी थीं। ग्रेगरी पैक को उन्होंने अपनी तस्वीर भी दी। बताया जाता है कि सुरैया की खूबसूरती पर ग्रेगरी इस कदर फ़िदा हुए कि उन्होंने अपने बैडरूम में सुरैया की तस्वीर को जगह दी। सुरैया को ग्रेगरी में देवानंद का अक्स दिखता था. ये कहा भी जाता था कि देव की एक्टिंग ग्रेगरी पैक से प्रभावित थी।
देवानंद- सुरैया ने ‘विद्या’ के बाद पांच और फ़िल्में साथ साथ की – जीत, शायर, नीली, दो सितारे और सनम। ‘जीत’ की शूटिंग के दौरान देवानंद ने सुरैया को प्रोपज़ किया। इस रिश्ते के लिए सुरैया की मां को कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन नानी ने ज़बरदस्त मुख़ालफ़त की। परिवार में नानी की हुकूमत चलती थी। इस रिश्ते को उन्होंने हिंदू-मुसलमान का सवाल बना दिया। लेकिन असल वज़ह थी कि सुरैया के बिना रोज़ी-रोटी कैसे चलेगी?
तमाम विरोधों के बावजूद देवानंद और सुरैया अपने फैसले पर अड़े रहे। इधर नानी ने सख़्त पहरे बैठा दिए। बताया जाता है कि नानी का साथ देने वालों में थे, मामा ज़हूर, जो फिल्मों में विलेन थे, और डायरेक्टर एम.सादिक, ए.आर कारदार और नौशाद जैसे नामी संगीतकार। शादी-शुदा एम.सादिक तो खुद सुरैया से शादी करना चाहते थे. सुरैया के परिवार का खाना-पीना और बाकी तमाम खर्च उठाने को भी तैयार थे।
एक दिन छुप कर देवानंद ने सुरैया को हीरे की अंगूठी दी। लेकिन नानी ने उसे दूर समंदर में फिंकवा दी। इस प्रेम को पति-पत्नी के रिश्ते का नाम देने के लिए दुर्गा खोटे ने उनको भाग कर शादी करने की सलाह दी। लेकिन एक दिलजले ने नानी को खबर लीक कर दी। दोनों ऐन मौके पर पकड़ लिए गए। सुरैया को नानी ने धमकाया कि अगर उसने देव का साथ नहीं छोड़ा तो देव का क़त्ल कर दिया जाएगा।
सुरैया डर गयी। ‘नीली’ फिल्म की शूटिंग के दौरान सुरैया ने देव को इस राज़ से वाकिफ़ कराया। देवानंद ने उन्हें थप्पड़ मार दिया – ‘कायर कहीं की।’ लेकिन सुरैया कुछ नहीं बोली, सह गयी. क्योंकि वो देव से वाकई बहुत प्यार करती थी और नहीं चाहती थी कि देव को उसकी वज़ह से कोई जिस्मानी नुकसान हो। बाद में देव ने इस हरकत के लिए सुरैया से माफ़ी भी मांगी।
सुरैया के बिना देवानंद गहरे अवसाद में चले गए। बड़े भाई चेतन आनंद ने देव को ढांढ़स बंधाया। देवानंद ने फिर भी कोशिशें जारी रखीं. लेकिन सुरैया डरती रहीं. अंततः अवसाद से बाहर आने की गरज़ से देवानंद ने कल्पना कार्तिक से शादी (1954) कर ली। इधर नानी ने बहुतेरी कोशिश की सुरैया की शादी कराने की। लेकिन सुरैया ने तय कर रखा था कि अगर देव नहीं तो कोई और भी नहीं। देवानंद ने अपनी आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाईफ़’ में सुरैया को अपना पहला प्यार बताते हुए लिखा है कि वो उसे कभी भूल नहीं सके।
वो उसकी मृत्यु पर कब्रिस्तान भी नहीं गए। इसलिए की पुरानी बातें याद आतीं। उन्होंने लिखा, मैं दूर से ही बहुत रोया. मौत ने उसे दुःखों से छुटकारा दिला दिया। सुरैया ने करीब सत्तर फिल्मों में काम किया. कुछ मशहूर फ़िल्में हैं – अनमोल घड़ी, उमर खय्याम, परवाना, दो दिल, दर्दे, प्यार की जीत, बालम, बड़ी बहन, दास्तान, मिर्ज़ा ग़ालिब, वारिस, शमा-परवाना, मिस्टर लंबू और शमा. 1963 में रिलीज़ ‘रुस्तम सोहराब’ सुरैया की आख़िरी फिल्म थी। उसके बाद उन्होंने खुद को घर में क़ैद कर लिया. कभी कभी ही बाहर निकलती थीं।
नानी पाकिस्तान चली गयी. मां भी गुज़र गयीं. उसके बाद सुरैया अकेली रह गयीं। उनकी सबसे प्यारी सहेली तब्बसुम कभी कभी उनसे मिलने जाती थीं. एक बार हाल पूछने पर सुरैया ने कहा – वक़्त कैसे गुज़ारती हूं, यह कोई नहीं पूछता। सुरैया बहुत अच्छी गायिका भी रहीं. उनके मशहूर गाने हैं – दिले नादां तुझे हुआ क्या है…ओ दूर जाने वाले वादा ना भूल जाना… नुक्तां चीं है ग़मे दिल उसको सुनाये न बने… तेरे नैनों ने चोरी किया मोरा छोटा सा जिया…ये कैसे अजब दास्तां हो गयी… ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाले यार होता… वो पास रहें या दूर रहें नज़रों में समाये रहते हैं।
जेवरात से सजने-धजने की बहुत ज्यादा शौक़ीन सुरैया बहुत ख़ामोशी से 31 जनवरी 2004 को इस फ़ानी दुनिया से रुख़सत हो गयीं थीं। कुछ अरसे बाद देवानंद भी लंदन के एक होटल में ऐसा सोये फिर न उठे। यह 03 दिसंबर 2011 की सुबह थी। जिस्म चले जाते हैं लेकिन प्रेम कहानियां अमर रहती है।









