Gold prices: सोने के बढ़ते दाम, टैरिफ और बैंकों की डिमांड बनी वजह

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नई दिल्ली, एजेंसियां। हाल के दिनों में सोने की कीमतों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है। इसी को लेकर चर्चा तेज है कि क्या शेयर बाजार पर भी इसका असर पड़ सकता है। आमतौर पर देखा गया है कि जब-जब सोने की कीमतें बढ़ी हैं, शेयरों में गिरावट दर्ज की गई है।

कई विश्लेषक तो इसे 1971 के ‘निक्सन शॉक’ से जोड़कर देख रहे हैं। उस दौर में सोना 1934 से स्थिर 35 डॉलर प्रति औंस पर था, लेकिन ‘निक्सन शॉक’ के बाद इसकी कीमतों में ज़बरदस्त उछाल आया और आने वाले दो दशकों तक सोना महंगाई और भू-राजनीतिक तनाव के चलते ऊंचाइयों पर बना रहा। उस समय शेयर बाजार में भी भारी गिरावट देखने को मिली थी। यही वजह है कि अब अमेरिका के टैरिफ फैसलों की तुलना भी उस दौर से की जा रही है। हालांकि, बीते दो दिनों में सोने के भाव में हल्की नरमी आई है।

ब्रोकरेज हाउस का दावा – कोई बड़ा रिस्क नहीः

आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज का कहना है कि इस बार हालात अलग हैं। उनके मुताबिक अब सोना और शेयर बाजार में पुरानी तरह का उल्टा रिश्ता नहीं रह गया है। सोने में तेजी का मतलब यह नहीं कि इक्विटी गिरेगी। ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि मौजूदा दौर में सोने के भाव चढ़ने और बाजार के रुझानों के बीच सीधा संबंध नहीं है, यह महज़ एक संयोग हो सकता है।

विश्लेषकों का कहना है कि जब तक टैरिफ से जुड़ा विवाद शांत नहीं होता और केंद्रीय बैंकों की ओर से सोने की मांग पूरी नहीं हो जाती, तब तक सोने के दाम ऊपर बने रह सकते हैं। लेकिन इसका इक्विटी मार्केट पर कोई सीधा असर नहीं होगा।

इतिहास में साथ-साथ चढ़े सोना और शेयरः

ब्रोकरेज का तर्क है कि अतीत में भी ऐसे मौके आए जब दोनों एक साथ बढ़े। 2008-09 के वित्तीय संकट के बाद, 2010 में केंद्रीय बैंकों के फैसलों से शेयर बाजार ने जबरदस्त रिकवरी की, वहीं सोना भी लगातार नई ऊंचाई पर पहुंचा। 1980 के दशक में भी यही पैटर्न देखने को मिला था, जब इक्विटी और सोना दोनों ने रिकॉर्ड स्तर छुआ था।

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