Plastic pandemic risk
नई दिल्ली, एजेंसियां। दुनियाभर में प्लास्टिक का इस्तेमाल खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है और इसका सीधा असर अब इंसानी सेहत पर साफ दिखने लगा है। प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित एक नए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि अगर प्लास्टिक की खपत मौजूदा रफ्तार से जारी रही, तो साल 2040 तक प्लास्टिक से जुड़ी बीमारियों का बोझ 2016 के मुकाबले दोगुना से भी ज्यादा हो सकता है।
पूरे लाइफसाइकिल में नुकसानदेह प्लास्टिक
अध्ययन के मुताबिक प्लास्टिक का नुकसान सिर्फ इसके इस्तेमाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पूरे लाइफसाइकिल—कच्चे माल के निष्कर्षण, उत्पादन, उपयोग, रीसाइक्लिंग और खुले में जलाने—से खतरनाक उत्सर्जन होता है। इसमें ग्रीनहाउस गैसें, जहरीले केमिकल और वायु प्रदूषक शामिल हैं, जो कैंसर, सांस की बीमारियों और अन्य गंभीर रोगों का कारण बन रहे हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि सबसे ज्यादा नुकसान प्लास्टिक के शुरुआती उत्पादन और खुले में जलाने से हो रहा है।
सेहत और पर्यावरण दोनों पर बढ़ता दबाव
लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के वैज्ञानिकों ने बताया कि प्लास्टिक सिस्टम से निकलने वाला प्रदूषण न सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा रहा है, बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी दीर्घकालिक असर डाल रहा है। अध्ययन में पहली बार वैश्विक स्तर पर यह आकलन किया गया है कि प्लास्टिक से होने वाले उत्सर्जन के कारण कितने डिसएबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर्स (DALYs) प्रभावित हो रहे हैं।
नीति में बदलाव की जरूरत
रिसर्चर्स ने जोर दिया कि वर्जिन प्लास्टिक के उत्पादन में भारी कटौती और गैर-जरूरी प्लास्टिक उपयोग पर सख्त नियंत्रण बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि प्लास्टिक की केमिकल संरचना को लेकर पारदर्शिता न होने से प्रभावी नीतियां बनाना मुश्किल हो रहा है।
ग्लोबल प्लास्टिक ट्रीटी की उम्मीद
इस खतरे को देखते हुए 175 से अधिक देशों ने ग्लोबल प्लास्टिक ट्रीटी पर सहमति जताई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक स्तर पर समन्वित और सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में प्लास्टिक इंसानी सेहत के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक बन सकता है।












