Rahul Gandhi Akhilesh Yadav scandal
नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद की कार्यवाही के दौरान माइक बंद होने का मुद्दा एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गया है। हाल ही में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के भाषण के दौरान माइक बंद होने को लेकर विपक्ष ने सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि उनकी आवाज दबाने के लिए जानबूझकर ऐसा किया जाता है, जबकि सत्ता पक्ष और संसदीय सचिवालय इसे नियमों और तकनीकी प्रक्रिया का हिस्सा बताते हैं।
माइक का कंट्रोल किसके पास होता है?
संसद की कार्यवाही के दौरान माइक का नियंत्रण लोकसभा अध्यक्ष या सदन की अध्यक्षता कर रहे पीठासीन अधिकारी के पास होता है। हालांकि, अध्यक्ष स्वयं माइक बंद या चालू नहीं करते। उनके निर्देश पर तकनीकी टीम और सचिवालय के अधिकारी माइक संचालित करते हैं। नियमों के अनुसार, केवल उसी सदस्य का माइक चालू रहता है जिसे अध्यक्ष ने बोलने की अनुमति दी हो।
माइक बंद करने से जुड़े प्रमुख नियम
अध्यक्ष की अनुमति अनिवार्य: नियम 350 के तहत बिना अनुमति बोले जाने पर माइक चालू नहीं किया जाता।
असंसदीय भाषा: यदि कोई सदस्य असंसदीय शब्दों का प्रयोग करता है, तो अध्यक्ष माइक बंद कराने या बयान रिकॉर्ड से हटाने का निर्देश दे सकते हैं।
समय सीमा: निर्धारित समय समाप्त होने पर माइक बंद किया जा सकता है।
हंगामा या स्थगन: भारी शोर-शराबे या कार्यवाही स्थगित करने की स्थिति में सभी माइक बंद कर दिए जाते हैं।
राहुल गांधी और अखिलेश यादव का मामला
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान राहुल गांधी ने चीन और डोकलाम से जुड़े मुद्दों का जिक्र किया। इस पर सत्ता पक्ष ने आपत्ति जताई और लोकसभा अध्यक्ष ने संबंधित दस्तावेज सदन में रखने को कहा। हंगामे के बीच राहुल गांधी का भाषण जारी रहा। इसी दौरान उनके समर्थन में बोलने खड़े हुए अखिलेश यादव का माइक कुछ देर बाद बंद कर दिया गया, जिसे विपक्ष ने मुद्दा बना दिया।
विपक्ष बनाम सत्ता पक्ष
विपक्ष का कहना है कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलते समय उनके नेताओं के माइक बंद किए जाते हैं, जबकि सत्ता पक्ष को अधिक समय और छूट मिलती है। वहीं, संसदीय सचिवालय का कहना है कि माइक संचालन पूरी तरह नियमों और अध्यक्ष के निर्देशों के अनुसार होता है।
क्यों बनता है विवाद?
संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होने के कारण माइक बंद होने पर जनता को केवल दृश्य दिखते हैं, आवाज नहीं, जिससे भ्रम और असंतोष पैदा होता है। इसी वजह से माइक बंद होने की हर घटना राजनीतिक विवाद का रूप ले लेती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सदन की कार्यवाही को सुचारू रखने के लिए नियम जरूरी हैं, लेकिन साथ ही विपक्ष की वैध आवाज को सुने जाने की पारदर्शी व्यवस्था भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए उतनी ही अहम है।












