Javed Akhtar statement:
मुंबई, एजेंसियां। दिग्गज गीतकार और लेखक जावेद अख्तर एक बार फिर अपने बेबाक बयान को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने महिलाओं द्वारा बुर्का या हिजाब पहनने के मुद्दे पर सवाल उठाते हुए इसे सामाजिक दबाव और मानसिक conditioning का परिणाम बताया है। संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से इंडियन परफॉर्मिंग राइट्स सोसाइटी (IPRS) द्वारा आयोजित एक सत्र के दौरान जावेद अख्तर ने यह बयान दिया, जिसमें छात्र और आम लोग मौजूद थे।
चेहरा ढकने की जरूरत क्यों?
कार्यक्रम के दौरान एक युवती ने जावेद अख्तर से सवाल किया कि क्या खुद को ढकने से महिला की ताकत कम हो जाती है। इसके जवाब में जावेद अख्तर ने कहा, “आपको अपने चेहरे से शर्म क्यों आनी चाहिए? लड़कियां अपना चेहरा क्यों ढकती हैं? उनके चेहरे में ऐसा क्या अशोभनीय है कि उसे छुपाया जाए?” उन्होंने इस प्रवृत्ति को सामाजिक दबाव से जोड़ते हुए कहा कि ऐसे फैसले अक्सर व्यक्ति अपनी मर्जी से नहीं करता, बल्कि समाज की अपेक्षाओं के कारण करता है।
सलीके और ढकने में फर्क बताया
जावेद अख्तर ने स्पष्ट किया कि सलीके से कपड़े पहनना और चेहरा ढकना दो अलग बातें हैं। उन्होंने कहा कि अत्यधिक खुले कपड़े, चाहे पुरुष पहनें या महिलाएं, गरिमापूर्ण नहीं लगते। जैसे ऑफिस या कॉलेज में पुरुषों के लिए भी एक ड्रेस सेंस होना चाहिए, उसी तरह महिलाओं को भी सलीके से कपड़े पहनने चाहिए। लेकिन चेहरे को ढकने का कोई तर्कसंगत कारण नहीं दिखता।
‘ब्रेनवॉश’ का आरोप
उन्होंने कहा कि अगर कोई महिला यह कहती है कि वह अपनी मर्जी से बुर्का पहनती है, तब भी यह सवाल उठता है कि कहीं उसका ब्रेनवॉश तो नहीं हो चुका। समाज में कुछ वर्ग ऐसे फैसलों की तारीफ करते हैं, जिससे यह दबाव और मजबूत होता है।
प्रथाओं को बढ़ावा न देने की अपील
जावेद अख्तर ने कहा कि महिलाओं को अपने कपड़ों को लेकर स्वतंत्र चुनाव का अधिकार होना चाहिए, लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक दबाव में पनपी प्रथाओं को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी सोच के दूरगामी परिणाम खतरनाक हो सकते हैं।

