Online gaming addiction: देश में 8 करोड़ से अधिक लोग ऑनलाइन गेमिंग की लत के शिकार, WHO ने गेमिंग डिसऑर्डर को मानसिक बीमारी माना

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Online gaming addiction

नई दिल्ली, एजेंसियां। भारत में ऑनलाइन गेमिंग का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ गेमिंग एडिक्शन का खतरा भी गंभीर रूप लेता जा रहा है। भारत सरकार की साइबर सुरक्षा एजेंसी इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) ने हाल ही में चेतावनी जारी करते हुए बताया कि देश में लाखों युवा ऑनलाइन गेमिंग की लत का शिकार हो रहे हैं।

ई-गेमिंग फेडरेशन के आंकड़ों के अनुसार

ई-गेमिंग फेडरेशन के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 40 करोड़ से अधिक गेमर्स हैं। इनमें से लगभग 70 प्रतिशत की उम्र 24 वर्ष से कम है। अनुमान है कि 15 से 20 प्रतिशत लोग गेमिंग एडिक्शन से प्रभावित हैं। यानी करीब 6 से 8 करोड़ लोग किसी न किसी स्तर पर इसकी लत से जूझ रहे हैं।

गेम डिजाइन बन रहा लत की वजह

I4C ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (NIMHANS) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि गेम्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि खिलाड़ी बार-बार खेलने के लिए प्रेरित हों। गेम खेलने पर दिमाग में डोपामिन नामक केमिकल रिलीज होता है, जो खुशी और उत्साह की भावना पैदा करता है। यही प्रक्रिया धीरे-धीरे लत में बदल जाती है।

मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर

रिपोर्ट के मुताबिक, जो युवा रोजाना दो घंटे से ज्यादा समय गेम खेलने में बिताते हैं, उनमें लत का खतरा अधिक देखा गया है। गेमिंग एडिक्शन से चिड़चिड़ापन, गुस्सा, पढ़ाई में गिरावट, नींद की कमी और सामाजिक दूरी जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। कुछ मामलों में बच्चों द्वारा आत्मघाती कदम उठाने जैसी गंभीर घटनाएं भी रिपोर्ट हुई हैं, जिससे विशेषज्ञों की चिंता बढ़ी है।

WHO ने माना ‘गेमिंग डिसऑर्डर’

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने “गेमिंग डिसऑर्डर” को मानसिक बीमारी की श्रेणी में शामिल किया है। यदि गेमिंग व्यक्ति के दैनिक जीवन, पढ़ाई, नौकरी और रिश्तों को प्रभावित करने लगे और वह इसे नियंत्रित न कर पाए, तो इसे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या माना जाता है।

कैसे पहचानें लक्षण?

  • घंटों तक लगातार गेम खेलना
  • हारने पर अत्यधिक गुस्सा करना
  • खाने-पीने और पढ़ाई की अनदेखी
  • फोन छीनने पर आक्रामक व्यवहार
  • ध्यान और एकाग्रता में कमी

लत से बचाव के उपाय

विशेषज्ञों का कहना है कि गेमिंग की आदत को अचानक बंद कराने के बजाय धीरे-धीरे कम करना चाहिए। बच्चों को खेलकूद, संगीत, पेंटिंग या अन्य रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करना मददगार हो सकता है। जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग भी करानी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार, डिजिटल युग में तकनीक से दूरी बनाना संभव नहीं है, लेकिन संतुलित उपयोग और जागरूकता ही गेमिंग एडिक्शन से बचने का सबसे प्रभावी तरीका है।

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