Rakshabandhan: रक्षाबंधन पर्व का इतिहास, महत्व और परंपरा

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नई दिल्ली, एजेंसियां। श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन पर्व केवल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक ही नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक परंपरा भी है। इसकी शुरुआत राजा बलि और देवी लक्ष्मी, और इंद्र-इंद्राणी के पौराणिक प्रसंगों से जुड़ी मानी जाती है।

कैसे शुरू हुआ रक्षाबंधन?

सनातन संस्था की बबीता गांगुली के अनुसार, पाताल लोक में राजा बलि को लक्ष्मी जी ने राखी बांधी थी और उन्हें अपना भाई बनाया। वहीं भविष्य पुराण के अनुसार, रक्षासूत्र बांधने की परंपरा राजाओं में शुरू हुई। एक अन्य कथा में इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर धागा बांधकर देव-दानव युद्ध में विजय सुनिश्चित की थी।

राखी बांधने की परंपरा और विधि:

राखी बाँधते समय ये वैदिक मंत्र बोला जाता है:
“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।”

बता दें राखी में चावल, मिश्री और रेशमी धागा उपयोग होता है जो सात्त्विक ऊर्जा को बढ़ाता है। बहन राखी बांधते समय रक्षा और समृद्धि की भावना रखे। भाई को भी बहन को सात्त्विक उपहार देना चाहिए जैसे धार्मिक पुस्तकें या जपमाला। दोनों को राष्ट्र और धर्म रक्षा की प्रार्थना करनी चाहिए।

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