धीरेंद्र ब्रह्मचारी
धीरेंद्र ब्रह्मचारी
धर्म और सियासत का गहरा मेल रहा है। राजनेता अक्सर धर्म गुरुओं की शरण में देखे जाते रहे हैं। चुनाव आते ही उनकी ये दखल और बढ़ जाती है।
कहा जाता है कि भारत में आज तक धीरेंद्र ब्रह्मचारी जैसा कोई धर्म गुरु नहीं हुआ। कहा जाता है कि देश पहली बार एक सन्यासी ने सियासत से धर्म का परिचय कराया।
ऐसा धर्म गुरु, जिसकी शरण में प्रधानमंत्री और पूरी सरकार चली गई थी। ऐसा धर्म गुरु जो प्रधानमंत्री को बंद कमरे में योग सिखाता था।
ऐसा धर्म गुरु, जिसके एक इशारे पर केंद्रीय मंत्री बदल जाते थे। यहां बात उसी धीरेंद्र ब्रह्मचारी की कर रहे हैं कि कैसे एक बिहार के मधुबनी का लड़का भारत के प्रधानमंत्री के कमरे तक पहुंच गया।
धीरेंद्र ब्रह्मचारी का परिचय
12 फरवरी 1924 को बिहार के मधुबनी में एक बालक का जन्म हुआ। परिवार ने नाम रखा धीरेंद्र चौधरी।
13 साल की उम्र में ही धीरेंद्र अपना घर-बार छोड़कर निकल पड़े और लखनऊ पहुंचे। यहां गोपालखेड़ा में महर्षि कार्तिकेय के आश्रम में शरण ली और योग सीखने लगे।
कुछ वक्त बाद धीरेंद्र चौधरी ने एक नई पहचान हासिल की। अपना नाम बदलकर धीरेंद्र ब्रह्मचारी रख लिया और खुद योग सिखाने लगे।
1950 आते-आते सफेद चमकदार दाढ़ी, गठीली कद-काठी और गहरी आंखों वाला वह संन्यासी दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में नजर आने लगा।
धीरेंद्र ब्रह्मचारी का राजनीतिक गलियारों में चर्चा
किसने सोचा था कि बिहार के मधुबनी ज़िले के छोटे-से गांव चानपुरा बासैठ का यह लड़का दिल्ली पर इतना हावी हो जाएगा।
इंदिरा गांधी जैसी ताकतवर नेता मुट्ठी में थी उसकी। वह पॉश फ्रेंड्स कॉलोनी की ए-50 नंबर की आलीशान कोठी में रहता था।
नेताओं, अभिनेताओं, बड़े उद्योगपतियों, मीडिया के लोगों का दिनभर आना-जाना रहता उसके यहां। चंद मिनटों के उसके दर्शन से वे ख़ुद को उपकृत महसूस करते।
धीरेंद्र ब्रह्मचारी की पहुंच प्रधानमंत्री आवास तक थी। इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी कभी उनकी बात नहीं टालते थे।
दोनों को विमानों का शौक था और संयोग कि यह शौक ही दोनों की मौत का कारण बना। संजय गांधी 23 जून 1980 को विमान हादसे का शिकार हुए।
धीरेंद्र ब्रह्मचारी की मौत 9 जून 1994 को विमान हादसे में हुई। दोनों हादसों का कारण बने दोनों विमान ब्रह्मचारी के ही थे।
दिल्ली को अंगुलियों पर नचाने वाले धीरेंद्र का जन्म हुआ था 1924 में। पिता का नाम बमभोल चौधरी। 12-13 साल की उम्र रही होगी, जब धीरेंद्र घर से भाग गए।
चारों ओर भटके और अंत में लखनऊ के पास गोपाल खेड़ा आश्रम में महर्षि कार्तिकेय से योग की शिक्षा ली। बाद में तंत्र-मंत्र में रुचि बढ़ गई।
धीरेंद्र चौधरी अब योग गुरु धीरेंद्र ब्रह्मचारी बन चुके थे। पटना के दानापुर कॉलेज के प्राचार्य ने उन्हें एक बार नई दिल्ली स्टेशन पर देखा और पहचान लिया।
कुछ लोगों का कहना है कि ब्रह्मचारी की पहचान चानपुरा के ही उनके एक बालसखा सदाशिव चौधरी ने की। कुछ लोग उनका मूल उपनाम शर्मा बताते हैं।
पहली बार धीरेंद्र ब्रह्मचारी को जवाहरलाल नेहरू के कारण प्रधानमंत्री आवास में प्रवेश मिला। वह नेहरू और बाद में 1966 में प्रधानमंत्री बनी उनकी पुत्री इंदिरा गांधी को योग सिखाते थे।
1964 में नेहरू के निधन के बाद ब्रह्मचारी का रुतबा और बढ़ गया। अब वह सुबह-सुबह इंदिरा गांधी को एक घंटा अकेले में योग की शिक्षा देते।
उन दोनों करीबी को लेकर कई तरह के गॉसिप भी चले। खुशवंत सिंह और मथाई ने तो इस बारे में लिखते समय सारी हदें पार कर दी थीं।
आजकल उनकी क़िताबें बैन हैं। इंदिरा ने इस बारे में प्रसिद्ध अमेरिकी फोटोग्राफर डोरोथी नॉर्मन को पत्र में लिखा था, ‘मैं सुबह जल्दी उठ जाती हूं।
बहुत सुंदर योगी मुझे योग सिखाता है। उसका शरीर इतना सुंदर है कि उसकी ओर कोई भी आकर्षित हुए बिना नहीं रहता।’
कैथरीन फ्रैंक ने अपने संस्मरणों में इसका उल्लेख किया है। इस पत्र से गॉसिप और तेज़ी से फैलने लगा, लेकिन ब्रह्मचारी या इंदिरा गांधी में से किसी ने इसके बारे में कभी और ज़्यादा खुलासा नहीं किया।
समय के साथ साथ ब्रह्मचारी का सम्मोहन बढ़ता गया। लोग उन्हें ‘भारतीय रासपुतिन’ कहने लगे। ग्रिगोरी रासपुतिन एक रहस्यमयी रूसी वैद्य, जोगी और तांत्रिक था। ब्रह्मचारी के साथ भी कुछ ऐसा ही रहा।
ब्रह्मचारी के कारण कई बार आमने-सामने हुए इंदिरा और नेहरूः
ब्रह्मचारी ने जम्मू, कटरा, मानतलाई और दिल्ली में विशाल आश्रम बनवाए। नई दिल्ली के गोल डाकखाना इलाके़ में विश्वायतन योगाश्रम खोला।
नेहरू के जमाने में विश्वायतन को रियायती ज़मीन मिली और सरकारी ग्रांट भी। 1950 और 60 के दशकों में प्रधानमंत्री कार्यालय में काम करने वाले जनक राज जय ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि तत्कालीन शिक्षा मंत्री डॉ. केएल श्रीमाली ने आश्रम की ग्रांट रोक दी थी।
इंदिराजी ने श्रीमाली से ग्रांट फिर शुरू करने के लिए कहा। श्रीमाली ने कहा कि आश्रम ने पिछले साल की ऑडिट रिपोर्ट नहीं दी है, इसलिए ग्रांट रोकी गई।
यह नियम है। दूसरी ओर ब्रह्मचारी का कहना था कि उन्होंने आजतक ऐसा नहीं किया है। इंदिरा गांधी ने इसकी शिकायत अपने पिता से की। बेटी के आग्रह पर नेहरू ने श्रीमाली से बात की।
श्रीमाली ने स्थिति समझाई। नेहरू ने वही बात इंदिरा से कही, लेकिन वह नहीं मानीं। इस पर नेहरू ने गुस्से में कहा, ‘क्या मैं उन्हें (श्रीमाली) हटा दूं।
उस आदमी ने (धीरेंद्र ब्रह्मचारी) ऑडिट रिपोर्ट क्यों नहीं पेश की?’ इस जवाब से इंदिरा कई दिनों तक पिता से नाराज रहीं।
एक बार इंदिरा ने तत्कालीन आवास मंत्री मेहरचंद खन्ना को चिट्ठी लिखी कि ब्रह्मचारी को सरकारी आवास में रहने दिया जाए।
खन्ना ने जवाब दिया, ‘आप किसी सरकारी पद पर नहीं हैं। इसलिए आपका सुझाव मैं मान नहीं सकता।
आप अपने पिता से कहें। जब तक नेहरू जी रहे, ब्रह्मचारी पर कुछ नियंत्रण रहा, लेकिन उनके निधन के बाद उनका फिर एक बार प्रधानमंत्री आवास में बोलबाला हो गया।
गुजराल का विभाग बदल गयाः
लेखिका मनीषा ने अपनी पुस्तक ‘प्रोफाइल्स ऑफ प्राइम मिनिस्टर्स’ में ब्रह्मचारी के बारे में एक और संस्मरण लिखा है।
इंदर कुमार गुजराल उन दिनों आवास राज्यमंत्री थे। उन्होंने ब्रह्मचारी के आश्रम के लिए नियमों का हवाला देकर और जगह देने से मना कर दिया।
ब्रह्मचारी गुस्से में उनके दफ्तर में पहुंचे और धमकी दी, ‘या तो आप मुझे जगह दो या कल से मंत्री पद से हाथ धो लो।’ कुछ ही दिनों में गुजराल का विभाग बदल दिया गया।
कई मुख्यमंत्री बदलवा दियेः
एक समय हेमवती नंदन बहुगुणा इंदिरा गांधी के खासमखास थे। उत्तर प्रदेश में 1974 का चुनाव इंदिरा के कहने पर ही उन्होंने लड़ा था। भारी बहुमत से जीते।
उनके नेतृत्व में सरकार बन गई। संजय और ब्रह्मचारी अपने आगे किसी मजबूत नेतृत्व को ठहरने नहीं देते थे।
लेकिन, बहुगुणा को हटाना आसान नहीं था। ब्रह्मचारी ने इंदिरा गांधी के कान भरने शुरू कर दिए। तंत्र-मंत्र पर तब इंदिरा विश्वास करने लगी थीं।
गले में एकमुखी रुद्राक्ष की माला भी ब्रह्मचारी के कहने पर पहनतीं थीं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता यशपाल कपूर ने संजय को बता दिया कि इंदिरा के ख़िलाफ़ बहुगुणा श्मशान में ‘मारण अनुष्ठान’ करा रहे हैं।
यशपाल कपूर को यह किसने बताया, इसका कभी खुलासा नहीं हुआ। संजय आगबबूला हो गए।
आईबी के तत्कालीन संयुक्त निदेशक मलयकृष्ण ने ‘ओपन सीक्रेट’ नामक अपनी क़िताब में इस घटना का विवरण दिया है।
उन्होंने लिखा है, ‘ब्रह्मचारी के कहने पर गुप्तचर विभाग को काम पर लगाया गया। गुप्तचरों ने दिल्ली के सारे श्मशान छान मारे, लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला।
ब्रह्मचारी ने सीधे सवाल-जवाब किए। आनन-फानन में उज्जैन के एक वैद्य को तांत्रिक के नाम पर पकड़ा गया। बात झूठ निकली, वैद्य को रिहा कर दिया गया।
पीसी सेठी उन दिनों मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। ब्रह्मचारी लेकिन आईबी की जांच से संतुष्ट नहीं हुए।
नतीजा यह हुआ कि बहुगुणा को 1975 में इस्तीफा देना पड़ा। कई राज्यों के मुख्यमंत्री संजय-ब्रह्मचारी की जोड़ी ने बदलवाए।
बंसीलाल को दिल्ली बुलाया गया। बनारसीदास गुप्ता को वहां बिठा दिया गया। 1975-77 के आपातकाल के दौर में ब्रह्मचारी के हाथ में अप्रत्यक्ष सत्ता थी।
विमान और लग्जरी कारों का शौकः
ब्रह्मचारी के विदेशों से विमान लाने और शिवा गन फैक्ट्री का किस्सा भी चर्चित है। संजय का दुर्घटनाग्रस्त विमान और साथ में कई शानदार महंगी कारें ब्रह्मचारी विदेश से लाए थे।
उनका दावा था कि उनके विदेशी शिष्यों ने ये चीज़ें उपहार में दी हैं। इसलिए कोई कस्टम ड्यूटी या टैक्स अदा नहीं किए।
लेकिन, यह बात झूठ निकली। मामला चला, पर ब्रह्मचारी के दबाव में रफादफा भी हो गया। इसी तरह ब्रह्मचारी ने जम्मू में शिवा गन फैक्ट्री स्थापित की थी।
स्वदेशी कच्चे माल से गन बनानी थीं, लेकिन छापे में 500 स्पैनिश गन बैरल्स मिलीं। डॉ. फारुख अब्दुल्ला छापे के दौरान ख़ुद पुलिस के साथ थे।
लेकिन, इंदिरा की करीबी के कारण ज़ब्त माल वापस कर दिया गया और फैक्ट्री का लाइसेंस भी बरकरार रहा।
आपातकाल के बाद हुए चुनाव में इंदिरा हार गईं, लेकिन तीन साल बाद फिर सत्ता में वापसी की। 14 जनवरी 1980 को वह फिर प्रधानमंत्री बनीं।
ब्रह्मचारी का सिक्का भी फिर चलने लगा। इसके छह माह के भीतर ही संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मौत हो गई।
उनकी पत्नी मेनका से अनबन के बाद इंदिरा अकेली पड़ गईं। अब धीरेंद्र ब्रह्मचारी ही उनका संबल थे।
लेकिन, 30 अक्टूबर 1984 को इंदिरा की हत्या के बाद ब्रह्मचारी के सितारे गर्दिश में आ गए।
स्थिति इतनी तेजी से बदली कि इंदिरा गांधी की अंतिम यात्र में ब्रह्मचारी को शामिल तक नहीं होने दिया गया। इसके बाद बेदिल दिल्ली ने उनसे दूरियां बना लीं।
अगले आठ साल उनके गुमनामी में बीते। फिर वह नया सपना लेकर मानतलाई आश्रम लौटे।
मानतलाई को नया सिंगापुर बनाना चाहते थे, जिसमें पांच हज़ार फुट लंबी, दो हज़ार फुट चौड़ी और 15 फुट गहरी झील, पांच हज़ारों कारों के लिए पार्किंग, मोनो रेल, घूमने वाला रेस्तरां, स्कूल-कॉलेज आदि होते।
ध्यान के लिए लंबी सुरंग भी बनाना चाहते थे। सुरंग के मुहाने पर तैनात करने के लिए उन्होंने भालू के दो बच्चे पाल रखे थे।
लेकिन, आज न ही वह सपना रहा और न ही वह साम्राज्य। पूरा आश्रम खस्ता हाल है। वहां की हवाईपट्टी, वॉच टावर, सबकुछ कबाड़ बन चुके हैं।
उस जगह को पर्यटन विभाग को सौंपा गया था, पर अभी तक कुछ हुआ नहीं। इसी तरह जम्मू के गांधीनगर में स्थित अपर्णा आश्रम का सरकार ने अधिग्रहण कर लिया।
वहां अब फूड क्राफ्ट इंस्टिट्यूट है। हरियाणा के आश्रम में ज़मीन को लेकर झगड़े चल रहे हैं। वहीं, दिल्ली का आश्रम अब मोरारजी देसाई नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ योगा बन चुका है।
तो ये थी एक योग गुरु की कहानी। एक ऐसा योग गुरु, जिसने पूरे देश पर राज किया पर उसका अंत गुमनानी की काल कोठरी में हुआ।
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