Bhupen Borah resignation update:
दिसपुर, एजेंसियां। असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा ने सोमवार (16 फरवरी 2026) को पार्टी से अपना इस्तीफा सौंपने के कुछ ही घंटे बाद वापस ले लिया। सुबह करीब 8 बजे उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को अपना इस्तीफा भेजा था, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि पार्टी हाईकमान उनकी समस्याओं और सुझावों की ओर ध्यान नहीं दे रहा है। इस इस्तीफे को लेकर राजनीतिक हलकों में काफी हलचल मची, क्योंकि असम में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं।
भूपेन बोरा ने इस्तीफे में क्या कहा?
भूपेन बोरा ने इस्तीफे में कहा था कि यह कदम उन्होंने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व संगठन और महत्वपूर्ण मामलों पर समय पर निर्णय लेने में असफल रहा है। पार्टी की अंदरूनी कमज़ोरी और लीडरशिप की निष्क्रियता पर भूपेन बोरा ने लगातार चिंता जताई थी। उनके अनुसार, कई मौकों पर उन्होंने मुद्दों को उठाया, लेकिन पार्टी टॉप लीडरशिप की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
इस्तीफे के तुरंत बाद बीजेपी ने भूपेन बोरा को ऑफर दिया। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि यदि भूपेन बोरा बीजेपी में शामिल होते हैं, तो उन्हें सुरक्षित सीट से चुनाव जीतने का मौका दिया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल भूपेन बोरा ने बीजेपी से किसी तरह का संपर्क नहीं किया है।
भूपेन बोरा ने लिया इस्तीफा वापस
इस्तीफा वापस लेने के पीछे पार्टी के नेताओं के प्रयास भी अहम रहे। असम कांग्रेस प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह ने कहा कि भूपेन बोरा कांग्रेस परिवार के एक अहम सदस्य हैं। कांग्रेस अध्यक्ष ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया और राहुल गांधी सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं ने लंबी बातचीत के बाद बोरा को मनाया। इसके अलावा वरिष्ठ नेताओं जैसे गौरव गोगोई, भंवर जितेंद्र सिंह और प्रद्युत बोरदोलोई भी गुवाहाटी में भूपेन बोरा से मिले और अंदरूनी मतभेद सुलझाने की कोशिश की।
बीजेपी ने भूपेन बोरा को दिया था ऑफर
भूपेन बोरा ने हालांकि इस्तीफा वापस लेने के बाद भी पार्टी की अंदरूनी समस्याओं और नेतृत्व की कमजोरियों की ओर संकेत दिया। उनका कहना था कि यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि उन्होंने इसे गहराई से सोचने के बाद लिया।इस घटना ने असम कांग्रेस में अंदरूनी तनाव और नेताओं की नाराजगी को फिर से उजागर किया है, साथ ही विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की रणनीति और संगठनात्मक मजबूती पर सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस के लिए यह चुनौती है कि वह ऐसे वरिष्ठ नेताओं को संतुष्ट रखे और पार्टी में स्थिरता बनाए रखे।













