Holi festival: होली पर क्यों खेले जाते हैं रंग? जानिए धार्मिक महत्व और हर रंग का अर्थ

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नई दिल्ली, एजेंसियां। हिंदू धर्म में होली का त्योहार बेहद खास माना जाता है। हर साल फाल्गुन माह की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है और उसके अगले दिन रंगों के साथ होली खेली जाती है। इस वर्ष 3 मार्च को होलिका दहन और 4 मार्च को रंगों की होली मनाई जाएगी। देशभर में होली अलग-अलग अंदाज में खेली जाती है, खासकर ब्रज क्षेत्र में लट्ठमार, फूलों वाली और लड्डूमार होली प्रसिद्ध है। लेकिन इन सबके बीच रंग और गुलाल ही इस पर्व का मुख्य आकर्षण होते हैं।

क्यों खेली जाती है रंगों वाली होली?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, होलाष्टक से लेकर होलिका दहन तक का समय शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक इस अवधि में ग्रहों की स्थिति उग्र होती है। ऐसे में होली के दिन विभिन्न रंगों का उपयोग करने से ग्रहों की नकारात्मकता कम होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मान्यता है कि रंग जीवन में उत्साह, उमंग और नई शुरुआत का प्रतीक हैं। प्राकृतिक रंगों से होली खेलने से न सिर्फ मन प्रसन्न होता है बल्कि स्वास्थ्य लाभ भी मिलता है। पुराने समय में टेसू के फूल, हल्दी और चंदन जैसे प्राकृतिक तत्वों से रंग बनाए जाते थे, जो त्वचा के लिए लाभकारी माने जाते थे।

अलग-अलग रंगों का महत्व

  • हरा रंग – ज्योतिष के अनुसार हरा रंग बुध ग्रह से जुड़ा है। यह विकास, संतुलन, समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है। हरा रंग जीवन में नई ऊर्जा और स्थिरता लाता है।
  • पीला रंग – पीला रंग गुरु ग्रह से संबंधित माना जाता है। यह ज्ञान, पवित्रता, सकारात्मकता और खुशी का प्रतीक है। मान्यता है कि पीला रंग लगाने से गुरु का शुभ प्रभाव बढ़ता है।
  • लाल रंग – लाल रंग मंगल ग्रह से जुड़ा है और इसे ऊर्जा, शक्ति, साहस और उत्साह का प्रतीक माना जाता है। होली में लाल गुलाल विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
  • गुलाबी रंग – गुलाबी रंग का संबंध शुक्र ग्रह से माना जाता है। यह प्रेम, स्नेह, कोमलता और सौहार्द का प्रतीक है।
  • नारंगी रंग – नारंगी रंग सूर्य से जुड़ा है। यह ऊर्जा, आत्मविश्वास और जीवन में प्रकाश का संकेत देता है।

इस तरह होली के रंग केवल उत्सव का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे धार्मिक, ज्योतिषीय और सांस्कृतिक महत्व भी जुड़ा हुआ है।

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