ये इश्क़ नहीं आसाँ से लेकर जब उन्हें देखूं तो प्यार आता है जैसे 90 शायरियों का संग्रहण ख़ास वैलेंटाइन डे 2026 के लिए

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इश्क है तो दर्द है, और दर्द है तो मरहम की जग़ह शायरी पढ़िए। इस वैलेंटाइन डे मतलब 14 फ़रवरी 2026 के वैलेंटाइन दिवस को बनाइये ख़ास। मीर, ग़ालिब, जौन, बशीर बद्र जैसे विश्व प्रशिद्ध शायरों की शायरियां भेजकर जताइए अपने दिल की बात अपने पार्टनर के साथ। इस पोस्ट में हमने 90 से भी ज्यादा शायरियों को संगृहीत किया है ताकि आपके पास विकल्पों को कमी न हो।

इश्क़ है तो दर्द है।
और दर्द है तो शायरी है।
वैलेंटाइन डे 2026 के मौके पर पढ़िए 90 ऐसी शायरियाँ,
जो कभी किसी ने लिखीं और कभी किसी ने जी लीं।
अगर प्यार ने कभी छुआ है, तो ये शेर आपको रोक नहीं पाएँगे।

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है— जिगर मुरादाबादी


उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है— राहत इंदौरी


मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले— मिर्ज़ा ग़ालिब


अच्छा ख़ासा बैठे बैठे गुम हो जाता हूँ
अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता तुम हो जाता हूँ— अनवर शऊर


होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है— निदा फ़ाज़ली


इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने— मिर्ज़ा ग़ालिब


चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है— हसरत मोहानी


करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम
मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता— ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर


कोई समझे तो एक बात कहूँ
इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं— फ़िराक़ गोरखपुरी


तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ— अल्लामा इक़बाल


तुम को आता है प्यार पर ग़ुस्सा
मुझ को ग़ुस्से पे प्यार आता है— अमीर मीनाई


यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे— जौन एलिया


दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं
कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं— जिगर मुरादाबादी


जो कहा मैं ने कि प्यार आता है मुझ को तुम पर
हँस के कहने लगा और आप को आता क्या है— अकबर इलाहाबादी


जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ
जाने क्यूँ लोग मिरे नाम से जल जाते हैं— क़तील शिफ़ाई


सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं— दाग़ देहलवी


आइना देख के कहते हैं सँवरने वाले
आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले— दाग़ देहलवी


झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं— कैफ़ी आज़मी


पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा— बशीर बद्र


कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी— परवीन शाकिर


इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है— जिगर मुरादाबादी


याद रखना ही मोहब्बत में नहीं है सब कुछ
भूल जाना भी बड़ी बात हुआ करती है— जमाल एहसानी


आख़री हिचकी तिरे ज़ानूँ पे आए
मौत भी मैं शाइराना चाहता हूँ— क़तील शिफ़ाई


मैं जब सो जाऊँ इन आँखों पे अपने होंट रख देना
यक़ीं आ जाएगा पलकों तले भी दिल धड़कता है— बशीर बद्र


वस्ल का दिन और इतना मुख़्तसर
दिन गिने जाते थे इस दिन के लिए— अमीर मीनाई


शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को
ख़ुशी की बज़्म में क्या काम जलने वालों का— दाग़ देहलवी


आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता— दाग़ देहलवी


कौन सी बात है तुम में ऐसी
इतने अच्छे क्यूँ लगते हो— मोहसिन नक़वी


मैं चाहता था कि उस को गुलाब पेश करूँ
वो ख़ुद गुलाब था उस को गुलाब क्या देता— अफ़ज़ल इलाहाबादी


लोग काँटों से बच के चलते हैं
मैं ने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं— अज्ञात


आते आते मिरा नाम सा रह गया
उस के होंटों पे कुछ काँपता रह गया— वसीम बरेलवी


निगाहें इस क़दर क़ातिल कि उफ़ उफ़
अदाएँ इस क़दर प्यारी कि तौबा— आरज़ू लखनवी


ज़िंदगी यूँही बहुत कम है मोहब्बत के लिए
रूठ कर वक़्त गँवाने की ज़रूरत क्या है— अज्ञात


क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़
जान का रोग है बला है इश्क़— मीर तक़ी मीर


बेचैन इस क़दर था कि सोया न रात भर
पलकों से लिख रहा था तिरा नाम चाँद पर— अज्ञात


मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है
कोई इंसान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता— बशीर बद्र


इलाज अपना कराते फिर रहे हो जाने किस किस से
मोहब्बत कर के देखो ना मोहब्बत क्यूँ नहीं करते— फ़रहत एहसास


दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं
लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं— क़तील शिफ़ाई


अंगड़ाई भी वो लेने न पाए उठा के हाथ
देखा जो मुझ को छोड़ दिए मुस्कुरा के हाथ— निज़ाम रामपुरी


हँस के फ़रमाते हैं वो देख के हालत मेरी
क्यूँ तुम आसान समझते थे मोहब्बत मेरी— अमीर मीनाई


इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही— मिर्ज़ा ग़ालिब


जब तुम से मोहब्बत की हम ने तब जा के कहीं ये राज़ खुला
मरने का सलीक़ा आते ही जीने का शुऊर आ जाता है— साहिर लुधियानवी


उसे किसी से मोहब्बत न थी मगर उस ने
गुलाब तोड़ के दुनिया को शक में डाल दिया— दिलावर अली आज़र


ये तो कहिए इस ख़ता की क्या सज़ा
मैं जो कह दूँ आप पर मरता हूँ मैं— दाग़ देहलवी


सिर्फ़ उस के होंट काग़ज़ पर बना देता हूँ मैं
ख़ुद बना लेती है होंटों पर हँसी अपनी जगह— अनवर शऊर


एक कमी थी ताज-महल में
मैं ने तिरी तस्वीर लगा दी— कैफ़ भोपाली


तुम फिर उसी अदा से अंगड़ाई ले के हँस दो
आ जाएगा पलट कर गुज़रा हुआ ज़माना— शकील बदायूनी


इस तअल्लुक़ में नहीं मुमकिन तलाक़
ये मोहब्बत है कोई शादी नहीं— अनवर शऊर


आज भी शायद कोई फूलों का तोहफ़ा भेज दे
तितलियाँ मंडला रही हैं काँच के गुल-दान पर— शकेब जलाली


चाहत का जब मज़ा है कि वो भी हों बे-क़रार
दोनों तरफ़ हो आग बराबर लगी हुई— ज़हीर देहलवी


दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद
अब मुझ को नहीं कुछ भी मोहब्बत के सिवा याद— जिगर मुरादाबादी


इश्क़ आसान नहीं होता, मगर उसका ज़िक्र बेहद ख़ूबसूरत होता है।
इस वैलेंटाइन डे 2026 पर हम आपके लिए लेकर आए हैं मोहब्बत की वो 90 शायरियाँ,
जिन्हें मीर, ग़ालिब, जौन, बशीर बद्र जैसे शायरों ने दिल से लिखा और ज़माने ने याद रखा।
हर शेर यहाँ किसी न किसी अधूरी, मुकम्मल या याद बन चुकी मोहब्बत की कहानी कहता है।


एक मोहब्बत काफ़ी है
बाक़ी उम्र इज़ाफ़ी है— महबूब ख़िज़ां


अभी आए अभी जाते हो जल्दी क्या है दम ले लो
न छेड़ूँगा मैं जैसी चाहे तुम मुझ से क़सम ले लो— अमीर मीनाई


इश्क़ में जी को सब्र ओ ताब कहाँ
उस से आँखें लड़ीं तो ख़्वाब कहाँ— मीर तक़ी मीर


अगरचे फूल ये अपने लिए ख़रीदे हैं
कोई जो पूछे तो कह दूँगा उस ने भेजे हैं— इफ़्तिख़ार नसीम


मिरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में
तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया— मीर तक़ी मीर


जब से तू ने मुझे दीवाना बना रक्खा है
संग हर शख़्स ने हाथों में उठा रक्खा है— हकीम नासिर


जो दिल रखते हैं सीने में वो काफ़िर हो नहीं सकते
मोहब्बत दीन होती है वफ़ा ईमान होती है— आरज़ू लखनवी


दिल है क़दमों पर किसी के सर झुका हो या न हो
बंदगी तो अपनी फ़ितरत है ख़ुदा हो या न हो— जिगर मुरादाबादी


फूल ही फूल याद आते हैं
आप जब जब भी मुस्कुराते हैं— साजिद प्रेमी


सुनो कि अब हम गुलाब देंगे गुलाब लेंगे
मोहब्बतों में कोई ख़सारा नहीं चलेगा— जावेद अनवर


ये मज़ा था दिल-लगी का कि बराबर आग लगती
न तुझे क़रार होता न मुझे क़रार होता— दाग़ देहलवी


फूल खिले हैं लिखा हुआ है तोड़ो मत
और मचल कर जी कहता है छोड़ो मत— अमीक़ हनफ़ी


जब उन्हें देखो प्यार आता है
और बे-इख़्तियार आता है— जलील मानिकपूरी


हज़रत-ए-दिल आप हैं किस ध्यान में
मर गए लाखों इसी अरमान में— दाग़ देहलवी


मेरे घर के तमाम दरवाज़े
तुम से करते हैं प्यार आ जाओ— अनवर शऊर


इश्क़ ही इश्क़ है जहाँ देखो
सारे आलम में भर रहा है इश्क़— मीर तक़ी मीर


कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो
मुझे एक रात नवाज़ दे मगर इस के बाद सहर न हो— बशीर बद्र


मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं
कि मंज़िल पे हैं और चले जा रहे हैं— जिगर मुरादाबादी


काँटे तो ख़ैर काँटे हैं इस का गिला ही क्या
फूलों की वारदात से घबरा के पी गया— साग़र सिद्दीक़ी


दिल का क्या हाल कहूँ सुब्ह को जब उस बुत ने
ले के अंगड़ाई कहा नाज़ से हम जाते हैं— दाग़ देहलवी


हमेशा हाथों में होते हैं फूल उन के लिए
किसी को भेज के मंगवाने थोड़ी होते हैं— अनवर शऊर


दुनिया से कहो जो उसे करना है वो कर ले
अब दिल में मिरे वो अलल-एलान रहेगा— फ़रहत एहसास


अब के मिलने की शर्त ये होगी
दोनों घड़ियाँ उतार फेंकेंगे— नासिर अमरोहवी


हर बच्चा आँखें खोलते ही करता है सवाल मोहब्बत का
दुनिया के किसी गोशे से उसे मिल जाए जवाब तो अच्छा हो— ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर


कई तरह के तहाइफ़ पसंद हैं उस को
मगर जो काम यहाँ फूल से निकलता है— राना आमिर लियाक़त


मुद्दत में शाम-ए-वस्ल हुई है मुझे नसीब
दो-चार साल तक तो इलाही सहर न हो— अमीर मीनाई


मोहब्बत नेक-ओ-बद को सोचने दे ग़ैर-मुमकिन है
बढ़ी जब बे-ख़ुदी फिर कौन डरता है गुनाहों से— आरज़ू लखनवी


बस एक ही बला है मोहब्बत कहें जिसे
वो पानियों में आग लगाती है आज भी— अजीत सिंह हसरत


सीने में आबाद हमेशा रहती है
पहली मोहब्बत याद हमेशा रहती है— अज्ञात


मिरे सारे बदन पर दूरियों की ख़ाक बिखरी है
तुम्हारे साथ मिल कर ख़ुद को धोना चाहता हूँ मैं— फ़रहत एहसास


दो तुंद हवाओं पर बुनियाद है तूफ़ाँ की
या तुम न हसीं होते या में न जवाँ होता— आरज़ू लखनवी


कुछ कहते कहते इशारों में शर्मा के किसी का रह जाना
वो मेरा समझ कर कुछ का कुछ जो कहना न था सब कह जाना— आरज़ू लखनवी


मैं ने क़ुबूल कर लिया चुप चाप वो गुलाब
जो शाख़ दे रही थी तिरी ओर से मुझे— चराग़ शर्मा


पता था मुझ को मुलाक़ात ग़ैर-मुमकिन है
सो तेरा ध्यान किया और गुलाब चूम लिया— शारिक़ कैफ़ी


मा’रका है आज हुस्न ओ इश्क़ का
देखिए वो क्या करें हम क्या करें— दाग़ देहलवी


निगह निकली न दिल की चोर ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं निकली
इधर ला हाथ मुट्ठी खोल ये चोरी यहीं निकली— दाग़ देहलवी


सीने से दिल निकाल के हाथों पे रख दिया
मैं ने तो बस कहा था कि धड़कन का शोर है— नील अहमद


क़ुबूल कर के इसे राब्ता बहाल करो
कहीं ये फूल मिरी आख़िरी पुकार न हो— आशू मिश्रा


सारे जज़्बे तिरी चाहत के दिखाई देते
काश आँखों में कहीं दिल भी धड़कता होता— नील अहमद


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