कोई दूसरा महेंद्र सिंह नहीं हुआ

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नीरज सिन्हा

पत्रकारीय लेखन में जुलूस, सभा, रैली, हिंसा, वारदात, हत्या, दंगा, जुल्म की न जाने कितनी खबरों और राजनीतिक विश्लेषण पर कलम चली हो, पर महेंद्र सिंह की हत्या के दिन राज्य भर से आने वाली खबरों पर नजरें रखना, प्रतिक्रियायें लेना और स्मृति में कुछ लिखना मेरे लिए बेहद कठिन हो रहा था।  महेंद्र सिंह आज जिंदा होते, तो 70 साल के होते। वे बगोदर से तीन बार विधायक रहे।

16 जनवरी 2005 को गिरिडीह जिले में सरिया थाना क्षेत्र के दुर्गी धवइया में नक्सलियों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी थी। साल 2005 का विधानसभा चुनाव लड़ा जाना था। तब हम हिन्दुस्तान अखबार में थे और चुनाव कवरेज की अहम जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

दफ्तर में खिड़की से झांकती धूप सेंकने की जुगत के बीच भाकपा माले के एक साथी का फोन आता है: वे घटना की जानकारी देते रहे, हम सन्न पड़ते रहे। उधर संपादक हरिनारायण सिंह जी तेज कदमों से अपने चैंबर से बाहर निकल रहे थे। उन्हें पूरी खबर मिल चुकी थी। उस दिन अखबार का पूरा शिडयूल बदल गया।

कई सीनियर्स लिखने में जुट गये। शाम साढ़े छह बजे डेस्क पर से मित्र अमित अखौरी का सवाल: नीरज तेरा कॉपी? हर हाल में 30 मिनट में गिरा देना। 27- 28 मिनट में लिखा. कहां शुरू किया, कहां खत्म ये पता नहीं।  

महेंद्र सिंह को राजनीतिज्ञों के दोहरे चरित्र से चिढ़ होती थी। कोई ताम- झाम नहीं. लाव- लश्कर नहीं। कभी विधायक होने का गुरूर नहीं। उनमें छद्म चेहरा नहीं था। जैसा अंदर वैसा बाहर।

जनता या वोटर, उनसे बेलाग कहते- “हमारी कसौटी पसंद हो तो साथ दें’’. नीति सिद्धांत से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। सत्ता की आंखों की किरिकरी बने रहने वाले महेंद्र विपक्ष में रहकर विपक्ष के बड़े नेताओं को भी कई मौके पर आईना दिखाने से बाज नहीं आते। अलबत्ता कई विधायकों के खिलाफ जनअदालत लगाकर वे सुर्खियों में रहे।

बुलंद आवाज की प्रतीक..

सड़क से लेकर सदन तक वे बुलंद आवाज की प्रतीक थे।  मुद्दे और सवालों पर लड़ते. हक और अधिकार की वकालत करते। झारखंड विधानसभा में जब वे बोलते तो पूरा सदन उन्हें खामोशी से सुनता।

महेंद्र ने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी, पर सरकारी दस्तावेजों, फाइलों पर इतनी पकड़ कि आला अफसर भी उनके सवालों से सकपकाये रहते।

तथ्यपरक बातों से वे सत्ता और सिस्टम को घेरना जानते थे। वर्ष 2000 ( एकीकृत बिहार विधानसभा) में उन्होंने कुछ विधायकों की यात्रा भत्ता की चोरी से पर्दा उठाते हुए सबको हलकान कर दिया था।

हमारे रिश्ते पर..

याद है, विधानसभा का सत्र जब शुरू होता, तो राज्य भर से लोग उनके पास पहुंचते। सबके अपने सवाल. उम्मीदों की गठरी बांधे लोगों को यही लगता कि महेंद्र सिंह ने अगर सवाल उठा दिया तो न्याय अथवा राहत जरूर मिलेगी। सदन से जब वे बाहर आते, तो पत्रकारों से घिर जाते।

कई पत्रकारों की यादों में वे अब भी मौजूद हैं। एक बार उन्होंने घपले- घोटाले से जुड़े दस्तावेज हमें दिये. वह रिपोर्ट अखबार ने छापी नहीं। उन्होंने मुस्कराते हुए कहाः “जाने दीजिये, इससे हमारे रिश्ते पर असर नहीं पड़ते”। हालांकि अगले कुछ दिनों में बातें सतह पर आने लगीं, तो वह रिपोर्ट छपी भी।

ड्राइवर तक के कपड़े धो डालते..

कभी उन्होंने ब्रांडेड कपड़े, ब्लैजर, गाउन, कोट नहीं पहनी। पैंट, कमीज के कपड़े खरीदने-सिलने में चार सौ रुपये से ज्यादा खर्च होने पर उनका मन कचोट जाता था। उनके सरकारी आवास पर कमरे में चौकी और उस पर पतला सा बिस्तरा, ओढ़ने के लिए कांटे वाला कंबल।  

कमरे में चारों ओर विधानसभा के दस्तावेजों, फाइलों अखबारों व किताबों की ढेर। साथ ही तकिये के पास ढेर सारा कतरन. गोलकी (काली मिर्च वाली) काली चाय उनकी आवास की पहचान थी। क्षेत्र के लगातार दौरे पर रहने की वजह से उनका चालक सुखदेव कभी थक अथवा ऊब जाते तो महेंद्र उसके कपड़े तक धो डालते।

कई मौके पर वे अपने और सहयोगियों के लिए खुद खाना पका लेते. मौजूदा दौर, रिवाज और व्यवस्था में यह दृढ़ता, समर्पण और आचरण किसी और नेता में होने की कल्पना मात्र बेमानी होगी।

याद में आज..

महेंद्र सिंह की याद में आज बगोदर में बड़ा जुटान होने वाला है. यह सिलसिला 19 सालों से चल रहा। गांव- गिराव से लोग इस जुटान में शामिल हो रहे हैं. कोई मुट्ठियां भींचे. कोई झंडा थामे. जन नायक की याद में गीत गाये जा रहे हैं।

संकल्प दोहराये जा रहे हैं. इन तैयारियों की कमान बगोदर से माले के विधायक और महेंद्र सिंह के बेटे विनोद संभाल रहे हैं। बातें बहुत हैं, पर अभी इतना ही.. खेतों में, खलिहानों में, जनता की यादों व अरमानों में जिंदा रहने वाले कॉमरेड तुझे सलाम..

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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