क्या केंद्र और राज्यों के बीच के विवाद का होगा निपटारा

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माइंस और मिनरल्स मामले में सुप्रीम का कोर्ट के फैसले का है इंतजार

रांची। खान-खदान की रॉयल्टी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में नौ जजों की बेंच सुनवाई कर रही है।

करीब डेढ़ दशक से चल रहे इस मामले में अब फैसला आने वाला है। इस फैसले का झारखंड पर व्यापक असर पड़ने वाला है।

खान-खदान एवं इसकी रॉयल्टी से जुड़े 11 बिंदुओं पर फैसला होना है। वर्ष 1957 में केंद्र सरकार ने माइंस एंड मिनरल डेवलपमेंट एक्ट लागू किया था।

इसके बाद से केंद्र एवं राज्यों के बीच विवाद चल रहा है। वर्ष 2011 में तत्कालीन जस्टिस एसएच कपाड़िया अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच से इस मामले को नौ जजों की बेंच को भेजा था।

कुल 11 बिंदुओं पर सुनवाई की जा रही है। केंद्र सरकार ने वर्ष 1957 में जब माइंस एंड मिनरल डेवलपमेंट एक्ट लागू किया था, तो एक झटके में माइंस और मिनरल्स (खान व खदान से निकलने वाले खनिज) का पूरा कंट्रोल केंद्र सरकार के पास चला गया।

इस कानून के सेक्शन नौ के मुताबिक, राज्य सरकार से माइंस लेने पर केंद्र सरकार को रॉयल्टी देनी पड़ेगी।

तमिलनाडु की सरकार ने इस नियम को पहली बार चुनौती दी थी। असके बाद से अब तक बिहार सरकार, बंगाल सरकार और यूपी सरकार की तरफ से अलग-अलग मामलों में रॉयल्टी के मामले को लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया।

वर्ष 1989 में सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बृहद पीठ ने इसी तरह से जुड़े एक मामले में यह फैसला सुनाया था कि माइंस से मिलने वाली रॉयल्टी केंद्र सरकार को मिलेगी. लेकिन वर्ष 2004 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने केसूराम इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम बंगाल सरकार के मामले में सुनवाई करते हुए यह पाया कि रॉयल्टी एक खर्च है, लेकिन इंडिया सीमेंट बनाम तमिलनाडु सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश दिया था, वह अलग था।

दोनों मामलों में अलग-अलग फैसलों के कारण इस मामले को नौ जजों की बेंच के समक्ष भेजा गया।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले की सुनवाई के बाद जो भी फैसला आयेगा, उसका असर झारखंड समेत उन सभी राज्यों पर पड़ेगा, जहां माइंस और मिनरल हैं।

शीर्ष अदालत का फैसला माइंस और मिनरल के मामले में केंद्र और राज्य सरकार की शक्तियों का निर्धारण करेगा।

अब तक हुई सुनवाई में झारखंड की ओर से बहस करते हुए वरीय अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने महत्वपूर्ण खनिजों पर टैक्स लगाने के अधिकार को चुपचाप छीनने के किसी भी प्रयास के प्रति आगाह करते हुए कहा था कि राज्य की टैक्स लगाने की शक्ति को संरक्षित करने के महत्व को देखते हुए फैसला लिया जाना चाहिए।

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