नवेंदु उन्मेष
यह बड़ी ही प्रसन्नता कि बात है कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को देर से ही सही केन्द्र सरकार ने भारत रत्न सम्मान दिये जाने का निर्णय लिया है। उनको बहुत पहले ही यह सम्मान मिल जाना चाहिए था। उनसे मुलाकात की एक याद मेरे जेहन में अब भी ताजा है। बात तब मैं हाई स्कूल में था और साहित्य में दिलचस्पी होने के कारण अक्सर हिन्दी के संत फादर कामिल बुल्के के मनरेसा हाउस स्थित आवास सह पुस्तकालय में बैठ कर पुस्तके पढ़ता था।
एक दिन की घटना है कि सुबह के वक्त में दो-चार बंदूकधारी पुलिस वाले पुस्तकालय में आये। उनके पीछे चलता हुआ धोती और बंडी पहने एक अधेड़ व्यक्ति भी आया और मुझसे पूछा फादर हैं? मैंने एक तख्ती की ओर इशारा करते हुए उनसे कहा उस तख्ती में देखिये लिखा क्या है? तख्ती देखने के बाद उस व्यक्ति ने फिर मुझसे कहा इसमें लिखा है फादर जलपान करने के लिए गये हैं इंतजार करें।
मैंने उस व्यक्ति को फादर के कक्ष में बैठकर इंतजार करने को कहा। कुछ देर के बाद जब फादर अपने कक्ष में आये तो उस व्यक्ति ने दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और बोला-मेरा नाम कर्पूरी ठाकुर है और मैं बिहार का मुख्यमंत्री हूं। यह नजारा देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया।
बिहार के मुख्यमंत्री के पास न कोई तामझाम था और न कोई चमकदार ड्रेस। यहां तक की दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी। दोनों के बीच बातचीत आगे बढ़ी तो कर्पूरी ठाकुर ने फादर बुल्के को रांची विश्वविद्यालय का कुलपति बनने का प्रस्ताव दिया जिसे ठुकराते हुए फादर ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को बर्बाद करना है तो उसे पुरानी गाड़ी खरीदवा दें। अगर किसी अध्येता को बर्बाद करना है तो उसे विश्वविद्यालय का कुलपति बना दें।
आज मैं सोचता हूं मुख्यमंत्री लाव-लश्कर के साथ चलते हैं लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के मनरेसा हाउस आने पर न कोई सायरन बजा, न उनके आने कि कोई हलचल हुई और न पुरूलिया रोड की सड़कें जाम हुई।
झारखंड बनने के बाद पत्रकार के रूप में मैंने रांची विश्वविद्यालय के एक-दो कुलपतियों को राज्य के शिक्षा मंत्री के घर पर मंत्री से मिलने के लिए इंतजार करते हुए पाया तो सोचा कि कहां फादर बुल्के जिन्होंने घर पर आये मुख्यमंत्री को कुलपति बनने से इनकार कर दिया था और आज के ये कुलपति।








