क्या वे मार्क्सवादी थे?

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सुशोभित

ह मेरे पिता के निजी-संग्रह की पुस्तक है। इसे उन्होंने 8 फ़रवरी, 1990 को तोपख़ाना कैम्प, उज्जैन से ख़रीदा था।

किताब पर उनके दस्तख़त हैं। कॉमरेड कमल सक्तावत की तरह अपना नाम दर्ज किया है। तब वे 36 वर्ष के थे और मैं आठ वर्ष का।

320 पृष्ठों के सजिल्द संस्करण वाली इस किताब का मूल्य 7 रुपया 25 पैसे था और प्रकाशक- बताने की आवश्यकता नहीं- प्रगति प्रकाशन, मॉस्को है।

सर्वहारा अधिनायकत्व पर मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन के लेख-संग्रह। मेरे पिता यह पुस्तक क्यों पढ़ते थे? क्या वे मार्क्सवादी थे?

क्या पता। लेकिन अगर हों भी तो कम से कम आरामकुर्सी वाले अवसरवादी कम्युनिस्ट नहीं थे। वे सर्वहारा वर्ग से वास्ता रखते थे। निम्न-मध्यवर्ग के शिक्षित व्यक्ति थे, जो आजीविका के लिए संघर्ष करते थे।

मुझे याद है, वे शिप्रा नदी के समीप स्थित कार्तिक चौक से रोज़ सुबह साइकिल से शहर के दूसरे, सुदूर छोर पर स्थित कोठी महल जाते थे और वहाँ पान-मसाले की एक गुमटी लगाते थे।

साँझ ढले घर आते। आते ही दूरदर्शन के समाचार सुनते। अख़बार पढ़ते। फिर विभिन्न अख़बारों के लिए लेख लिखकर भेजते। उसी के बाद भोजन करते थे। एक सर्वहारा बुद्धिजीवी की आदमक़द तस्वीर!

बचपन में यह किताब मैंने भी पढ़ी थी, अलबत्ता समझ नहीं आई थी। लेकिन मार्क्सवाद की पारिभाषिक-शब्दावली जैसे बूर्ज़्वाज़ी, प्रोलितारी, उजरती श्रम, बेशी मूल्य, वर्ग-संघर्ष, मज़दूर आंदोलन, कम्युनिस्ट इंटरनेशनल, जर्मन आइडियोलॉजी, गोथा कार्यक्रम, पेरिस कम्यून, लूई बोनापार्त की अठारहवीं ब्रूमेर, मैनिफ़ेस्टो, यूटोपिया, जनवाद, सोवियत आदि मेरी स्मृतियों में रचे-बसे हैं।

कल्पना करें कि यह 1980 के दशक का उत्तरार्द्ध है और एक शिक्षित पुरुष- जिसे किसी अच्छी नौकरी में होना चाहिए था- आजीविका के किसी और विकल्प के अभाव में पान-मसाले की गुमटी चलाता है (कत्थे-चूने से उसके हाथ हमेशा रंगे रहते हैं!), परिवार का भरण-पोषण करता है, बच्चों को शिक्षा दिलवाता है, साथ ही अवैतनिक पत्रकारिता भी करता है… और मात्र पचास-साठ रुपयों की रोज़मर्रा की आमदनी होने के बावजूद 7 रुपया 25 पैसे की एक किताब ख़रीदकर पढ़ता है! सर्वहारा अधिनायकत्व पर मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन के लेख-संग्रह!

अतीत की ऐसी बुनियाद पर ही भविष्य के नैतिक, बौद्धिक और आत्मिक भवन निर्मित होते हैं!

लेखक : देश के जाने-माने पत्रकार हैं।

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