सुशोभित
मेरे हाथों में व्योमेश की किताब ‘आग और पानी’ (बनारस पर एकाग्र गद्य) है। यह इसका पहला संस्करण है। अब तो इसके चार संस्करण आ चुके और पाँचवाँ भी आ रहा है। हाल-फिलहाल में हिन्दी में ग़ैर-राजनैतिक, कलानिष्ठ, कथेतर गद्य की कम ही पुस्तकें होंगी, जो इतनी लोकप्रिय रही हों। मुझे तब आश्चर्य हुआ था, जब मैंने पाया कि सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तकों की कथेतर श्रेणी में इसका नाम नहीं था। बहरहाल, इस पुस्तक की लोकप्रियता के लिए लेखक के साथ ही पाठक- विशेषकर दोआब और काशी के पाठक- जिन्हें कुबेरनाथ राय ने गंगातीरी निषादों के वंशज कहा है- भी इतने ही शुभकामनाओं के पात्र हैं, जिन्होंने अपने जनपद के कलात्मक-रूपों- उनमें भी विशेषकर संगीत और साहित्य- की संस्तुति करने वाली एक विनयी-पोथी को सिर-आँखों बिठाकर हिन्दी के रचनात्मक गद्य को नई प्रश्वास दी हैं।
व्योमेश से मैं कभी मिला नहीं, पर उनसे मेरा सारस्वत-परिचय अब डेढ़ दशक पुराना हो चुका है। 2009 में उन्हें भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला था। तब यह माना गया था कि समकालीन कविता के परिदृश्य पर एक धूमकेतु का उदय हुआ है। व्योमेश जैसी चमक, तैयारी और प्रतिभा के साथ तब और कोई युवा कवि अवतरित नहीं हुआ था। उनका व्यक्तित्व भी तब प्रखर और मुखर था। मुक्तिबोध ने कहा है कि “प्रतिभा का अपना औद्धत्य होता है!” इसे बदलकर व्योमेश ने तब- एक समकालीन कवि पर वक्रोक्ति शैली में टिप्पणी करते हुए- कर दिया था कि “औद्धत्य की भी अपनी प्रतिभा होती है!” यह ‘प्रतिभा’ उनमें भी कम न रही होगी। किन्तु कालान्तर में उनके व्यक्तित्व में माधुर्य-भाव का उदय हुआ। वे उत्तरोत्तर सौम्य होते चले गए। कदाचित् इसका कारण रंगकर्म की उनकी निष्ठाएँ रही होंगी। एक ड्रामा-कम्पनी चलाना किसी कुटुम्ब को पालने जैसा है। इतने सारे जनों- अधिकतर युवाओं- को साथ लेकर चलना, उनसे काम लेना, कभी किसी के कान उमेंठकर, कभी किसी की मान-मनौव्वल करके हिन्दी-पट्टी में वैसा थिएटर करना सरल नहीं है, जिसकी प्रतिज्ञाएँ व्यावसायिक नहीं कलात्मक हों। इससे व्यक्तित्व में धैर्य और सहिष्णुता का समावेश हो जाता है। अभिभावकों वाली गुरुता आ जाती है।
व्योमेश का कवि-रूप अगर व्योमेश 1.0 था, तो रंग-निर्देशक वाला रूप व्योमेश 2.0 रहा। इसे हिन्दी की दुनिया में बहुत सहज-भाव से स्वीकार नहीं किया गया। व्योमेश जब कविता के परिदृश्य पर उभरे थे, तब उन्हें मूर्धन्यों की प्रशस्ति और समकालीनों की सराहना मिली थी। हिन्दी का साहित्य-संसार अपने कवि से एक विशेष प्रकार के एक्टिविस्टनुमा व्यवहार की अपेक्षा रखता है और मन ही मन चाहता है कि वह मोर्चे खोले, आन्दोलन चलाए, समय-समय पर राजनैतिक-वक्तव्य देकर अपनी पक्षधरता के शुक्ल-पक्ष को प्रकाशित करे और जातीय कलारूपों के प्रति प्राय: उपेक्षादृष्टि रखे। व्योमेश ने पाया कि कविता में वे स्वयं को अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे हैं। उनके भीतर से बनारस का जनपद बोलना चाह रहा था। उन्होंने संगीत और नाट्य में अपनी जातीय-पहचान और बुनियाद की अभिव्यक्ति खोजी और पाई। अपनी मनोदशा के बारे में एक जगह उन्होंने लिखा था :
“मेरी कविता पसंद की गई और उसे पुरस्कार आदि भी मिले। लेकिन मैं जैसी कविता लिखता था, सिर्फ़ वैसी ही कविता पसंद नहीं करता था। हिन्दी साहित्य संसार में अभिरुचि की तानाशाही है। आप बहुत-सी चीज़ों को एक साथ पसंद नहीं कर सकते, अन्यथा आप ग़द्दार और दिग्भ्रमित मान लिए जायेंगे। मैं चुप था, लेकिन तबला, निराला की कविताएँ, कामायनी, रामलीला जैसी बातों की लहर तड़प की तरह उठती रहती थी। मैं पूरी तरह से व्यक्त नहीं हो पा रहा था।”
व्योमेश ने रूपवाणी नामक एक रंगमण्डल का गठन किया और ‘कामायनी’ और ‘शक्तिपूजा’ का मंचन किया। उनकी टोली में युवतम संगीतकार, लेखक, कलाकार और रंगकर्मी हैं। वे आश्वस्त हुए। सहज भी हुए। उनके पहले और दूसरे कविता-संग्रह के बीच 11 वर्षों का फ़ासला था और दूसरे को आए भी 4 वर्ष हो चुके हैं। कवि के रूप में इतनी सराहनाएँ और स्वीकार्यता मिलने के बावजूद अपनी रचनात्मक-बेचैनी का उत्तर खोजने के लिए अन्य-माध्यमों में स्वयं को आविष्कृत करना एक कलाकार के नैतिक-साहस का ऐसा उदाहरण है, जो वर्तमान में विरले ही मिलता है।
गद्यकार व्योमेश को आप उनका 3.0 संस्करण कह सकते हैं, यों गद्य लिखना उनके लिए नया चलन नहीं। पर सोशल मीडिया पर यत्र-तत्र लिखे लेखों के प्रति लोकरुचि के उमड़ाव और ‘आग और पानी’ की लोकप्रियता ने पहले कवि, फिर रंग-निर्देशक और अब गद्यकार के रूप में प्रतिष्ठित व्योमेश को नया आयाम दिया है। उनके गद्य में रचनात्मक प्रवाह है, सौष्ठव है, जातीय-स्मृतियाँ हैं और अपने देशकाल से गहरा लगाव है। हिन्दी में इतना प्रगल्भ गद्य लिखने वाला आज कदाचित् कोई और नहीं। उनकी गद्य की नई पुस्तक भी ‘आग और पानी’ की ही तरह रुख़ से आ रही है, जिसमें उनके आत्म-संस्मरण होंगे। मुझे विश्वास है, वह भी इतनी ही सराही जायेगी। और बनारस के रस में रचे-बसे, काशीस्थ व्योमेश आगे भी अपनी सरलता, स्वाभाविकता, बालकोचित उत्फुल्लता और आश्चर्य, बौद्धिक प्रखरता और कलात्मक निष्ठा के साथ निरन्तर सक्रिय रहेंगे, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ।
लेखक : देश के जाने-माने पत्रकार हैं।









