धर्म की अफीम ने लोकतंत्र के विवेक का चीरहरण कर दिया है

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सुशोभित

अतीत में ऐसा होता था कि जनता सरकार को सबक़ सिखाने के मूड में रहती थी। सरकार मग़रूर हो (१९७७), ख़ुशफहमी में हो (२००४), चोर हो (१९८९, २०१४) तो जनता उसको बाहर का रास्ता दिखा देती थी। महंगाई वग़ैरह के सवाल पर राज्यों की सरकारें भी गिरती रही हैं। डेमोक्रेसी फंक्शनल थी।

लेकिन आज ये आलम है कि अवाम जानती है हाकिम मग़रूर है, ख़ुशफहमी में है और चोर नहीं महाचोर है, चिंदी चोर नहीं चंदा चोर है, फिर भी बेशर्मी से कहती है कि इसको ही फिर से लाएंगे। क्यों?

क्योंकि इसने हमारे रिलीजन को सिर पर बैठाया। डेमोक्रेसी में रिलीजन सबसे बड़ा फैक्टर बन गया है। धर्म की इस अफीम ने लोकतंत्र के विवेक का चीरहरण कर दिया।

भजन-कीर्तन में मगन जनता कहती है जो राम को लाये उनको हम लाएंगे! रे मूढ़ो, वो राम की मूर्ति भर लाए हैं, राम को तो देश निकाला दे दिया है।

भारतीय चेतना से मर्यादा इतनी बहिष्कृत पहले कभी नहीं हुई थी। पुरुषोत्तम की प्रतिमा से ही मर्यादा नहीं आती, चरित्र से आती है। वो तो रहा नहीं!

चंदा उगाही के शर्मनाक ब्योरे सामने आ रहे हैं। अभी बहुत राज़ खुलना तो बाक़ी हैं। छापे मारकर रसीदें कटवाई गई हैं, हुंडी-पर्चियां लेकर निविदाएं दी गई हैं, वैक्सीन बनाने वाले तक से चंदा लिया गया।

जब लोग महारोग से मर रहे थे तब हाकिम बंगाल में भीड़ जुटा रहा था। बाद में टीके से भी उसने माल बना लिया। आपदा में अवसर!

देश के नौजवान जो भरी जवानी में दिल के दौरे से मर रहे हैं, वह क्या वैक्सीन घोटाला नहीं है? पर जनता गाफ़िल है।

जनता को मूर्ख बनाते रहने के लिए चंदा चोर रोज़ मन्दिर में जाकर फ़ोटो खिंचवाता है। कभी त्रिशूल तो कभी त्रिपुंड दिखाता है।

लेकिन बचपन में हम सुनते थे कि जब कोई ज़्यादा ही पूजा-पाठ करने लगे तो समझ जाना अतीत के पाप धोने के जतन कर रहा है या आने वाले पापों के लिए गुंजाइश बना रहा है।

बगुला भगत मुहावरा तो सुना ही होगा!

लेखक : देश के जाने-माने पत्रकार हैं।

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