शुंगकाल में शुरू हुआ था सोनपुर मेला [Sonpur Mela], हर तरह के पशु-पक्षियों की यहां होती है बिक्री

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मोक्षदायिनी गंगा और नारायणी गंडक के संगम स्थल पर लगने वाले सोनपुर मेले की पहचान विश्व प्रसिद्ध पशु मेले के रूप में रही है।

सोनपुर मेले की उत्पति

माना जाता है कि सोनपुर मेला उत्तर वैदिक काल में शुरू हुआ। महापंडित राहुल सांकृत्यायन का मत है कि मेला शुंगकाल में शुरू हुआ।

सोनपुर मेले में लगभग 2500 वर्ष पहले से लोग पशुओं की खरीद-बिक्री तथा अदला-बदली के लिए आते थे।

वे अपनी जरूरत के मुताबिक पशुओं को लेकर यहां से जाते थे। आदिकाल में सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य इस मेले से हाथी और घोड़े खरीद कर ले जाया करते थे।

युद्ध में लड़ने वाले ये सभी बेहद दमदार हाथी और घोड़े हुआ करते थे, जिनका इतिहास में पहली बार मौर्य सम्राट को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी विजय पताका लहराने में महत्वपूर्ण योगदान था।

सोनपुर मेले के प्रारंभ होने की तिथि, चन्द्र तिथि के अनुसार तय होती है। हर साल कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर-दिसंबर) में लगने वाला यह मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है।

यह मेला भले ही पशु मेला के नाम से विख्यात है। 5-6 किलोमीटर के वृहद क्षेत्रफल में फैला यह मेला हरिहरक्षेत्र मेला और छत्तर मेले के नाम से भी जाना जाता है।

हर साल कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के साथ यह मेला शुरू हो जाता है और एक महीने तक चलता है। यहां मेले से जुड़े तमाम आयोजन होते हैं।

इस मेले में कभी अफगान, इरान, इराक जैसे देशों के लोग पशुओं की खरीदारी करने आया करते थे।

1857 की लड़ाई के लिए बाबू वीर कुंवर सिंह ने भी यहीं से अरबी घोड़े, हाथी और हथियारों का संग्रह किया था। अब भी यह मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है।

देश-विदेश के लोग अब भी इसके आकर्षण से बच नहीं पाते हैं और यहां खिंचे चले आते हैं।

अंग्रेजी शासनकाल में बिहार के हथुआ, बेतिया, टेकारी और दरभंगा महाराज की ओर से सोनपुर मेले के अंग्रेजी बाजार में नुमाइशें लगायी जाती थी।

यहां कश्मीर, अफगानिस्तान, ईरान, लीवरपुल और मैनचेस्टर में बननेवाले बेशकीमती कपड़ों और बहुमूल्य सामग्रियों की खरीद-बिक्री होती थी।

यहां बहुमूल्य वस्तुओं में सोने-चांदी और हीरे के जेवरात , हाथी दांत से बनी वस्तुएं, दुर्लभ पशु-पक्षी यथा तोता- मैना, हिरण, मोर आदि के बाजार लगते थे।

इस मेले की चर्चा महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक वोल्गा से गंगा में हरिहरक्षेत्र के रूप में की है।

सोनपुर मेले में मिलने वाले पशु-पक्षी

हालांकि जिस प्रकार राजस्थान का पुष्कर मेला ऊंटों की वजह से फेमस है, उसी तरह सोनपुर हाथियों को लेकर विश्वप्रसिद्ध है।

लेकिन सरकार की ओर से लगाये गये पशु संरक्षण कानून की वजह से अब मेले में हाथियों की बिक्री नहीं होती।

हालांकि अन्य सभी प्रकार के पालतू पशु-पक्षी यहां बिकते हैं और प्रदर्शित किए जाते हैं।

मेले में गाय-बैल, ऊंट और भैंस की भी बिक्री होती है। लोग पशुओं को बेहतर और विशेष बताने के लिए अजीबोगरीब रूप से सजाते हैं और ग्राहकों को आकर्षित करते हैं।

इस सिलसिले में आपको कुछ ऐसे जीव भी देखने को मिल जाएंगे जो सोनपुर मेले के अलावा कहीं और नहीं मिल सकते।

लोग सालभर अपने पशुओं की सेवा इसलिए करते रहते हैं कि सोनपुर में उन्हें अधिक दाम मिल सके।

पशुओं के अलावा खेती और कला-संस्कृति से जुड़ी चीजें भी सोनपुर में बिकती हैं। हस्तशिल्प से लेकर पेंटिंग सहित अन्य चीज़ों को भी देख-परख सकते हैं।

अब हालांकि सोनपुर पशुमेले के साथ-साथ सांस्कृतिक समागम के रूप में भी जाना जाने लगा है। लिहाजा खरीदार ही नहीं, बल्कि देशी-विदेशी पर्यटक भी मेले में खूब आते हैं।

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