बरेली, एजेंसियां। संतोष गंगवार हर बार अपनी मौन को अपनी आवाज बनाकर आगे बढ़ते गए। ‘मेरे लिए क्या करना है, यह पार्टी तय करे’… यह बात हर बार दोहराने वाले संतोष गंगवार को पार्टी ने वही भूमिका दी, जिसका अंदाजा पिछले काफी दिनों से लगाया जा रहा था।
चुनावी जनसभाओं के मंच पर इसके संकेत मिल चुके थे। आठ बार संसद में प्रतिनिधित्व कर चुके पूर्व सांसद संतोष गंगवार का अब नया पता झारखंड का राजभवन हो चूका है।
शनिवार देर रात उन्हें राज्यपाल बनाए जाने की घोषणा हुई, जिसकी भूमिका पहले ही बन चुकी थी। इस बीच लोकसभा चुनाव के दौरान स्थानीय स्तर पर कई बार उठापटक हुईं।
लोकसभा चुनाव लड़ने की थी इच्छा
संतोष गंगवार ने लोकसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी लेकिन, टिकट घोषणा में उनका नाम नहीं था। उस समय उनके राज्यपाल बनने की अटकलें लगाई जाने लगी थीं।
वह ऐसी चर्चाओं को यह कहकर किनारे कर देते थे कि पार्टी ने मेरे लिए जो भी सोचा होगा, वह उचित ही होगा। वह सब्र किए बैठे थे, दूसरी ओर दिल्ली में उनकी भूमिका तैयार की जा रही थी। इसका संकेत चुनावी जनसभाओं में मिलना शुरू हो चुका था।
तीन मई को रामलीला मैदान में चुनावी जनसभा करने आए गृह मंत्री अमित शाह ने मंच से घोषणा की थी कि संतोष गंगवार के लिए बड़ी जिम्मेदारी तय करके रखी गयी है। वह बड़े नेता हैं, वह जल्द ही नई भूमिका में दिखाई देंगे।
इससे पहले फरवरी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पीलीभीत की जनसभा में गए थे तो संतोष गंगवार को अपने बगल में बैठाया था। वह बरेली में रोड शो करने आए तब भी उनके वाहन में संतोष गंगवार साथ खड़े थे। पार्टी जानती थी कि वह पिछड़ा वर्ग का बड़ा चेहरा हैं।
बरेली से इस बार छत्रपाल सिंह बने हैं सांसद
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी जनसभा में कह गए थे कि यह चुनाव संतोष के नेतृत्व में लड़ा जा रहा है। बाद में जब चुनाव की बारी आई तो संतोष के मैदान में न होने के बावजूद भाजपा ने अपना गढ़ बचाए रखा।
बरेली सीट पर छत्रपाल सिंह गंगवार सांसद बने, जिसके बाद पूर्व सांसद हो चुके संतोष का कद और बढ़ा। पार्टी नेतृत्व ने माना कि मैदान के बाहर रहने के बावजूद उन्होंने बरेली की सीट को बचाए रखने में भूमिका निभाई।
संतोष गंगवार के राजनीतिक सफर के बारे में
राजनीति में कैसे आए, इस पर संतोष कहते हैं कि आपातकाल के दौरान जेल जाना पड़ा। एक वर्ष जेल में काटने के बाद जब बाहर आए तो उनके सोचने का तरीका थोड़ा बदल गया।
इसी बीच थोड़ा समय बीतने के पश्चात जनता पार्टी की बरेली जिला कमेटी में उन्हें महामंत्री का पद प्रस्तावित किया गया तो उन्होंने स्वीकार कर लिया।
वर्ष 1980 में अचानक पता चला कि उन्हें पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की पत्नी बेगम आबिदा के सामने पहला लोकसभा चुनाव लड़ना है। वह चुनाव हार गए, दिशा तय हो चुकी थी।
वर्ष 1984 में भी यही कहानी दोहराई गई। वर्ष 1989 के आम चुनाव में उन्होंने बेगम आबिदा को पराजित कर पहली जीत दर्ज की थी।
वर्ष 1989, 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में लगातार जीते।
वर्ष 2009 का चुनाव कांग्रेस से हारे परंतु, इसके बाद वापसी की।
2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव जीतकर संतोष गंगवार ने साबित कर दिया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनके बिना आगे नहीं बढ़ेगी।
संगठन के बाद सरकार में उनका कद बढ़ता गया। वह अटल बिहारी वाजपेयी व नरेन्द्र मोदी की सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे।
पेट्रोलियम, कपड़ा, वित्त, श्रम व रोजगार आदि विभाग संभाले थे। अपना फोन हमेशा खुद रिसीव करने वाले, प्रतिदिन भारत सेवा ट्रस्ट स्थित कार्यालय पर लोगों से मिलने की आदत उन्हें सुलभ नेता बनाती गई।
मुझे जो जिम्मेदारी मिली, उस पर खरा उतरुंगा : संतोष
नई भूमिका मिलने से अभिभूत संतोष गंगवार ने कहा कि पार्टी ने हमेशा बिना मांगे मुझे सबकुछ दिया। अब राज्यपाल बनाकर मेरे प्रति विश्वास व्यक्त किया है।
इसके लिए मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी आभारी हूं। उन्होंने मेरे लिए नई जिम्मेदारी दी है, उस पर खरा उतरुंगा।
संतोष गंगवार ने कहा, कि क्षेत्र की जनता का भी आभार, जिसने मुझ जैसे सामान्य कार्यकर्ता पर लगातार भरोसा जताया। लगातार अटूट विश्वास और प्यार बनाए रखा।
इसे भी पढ़ें









