एकता और समता के पोषक संत रविदास

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डा जंग बहादुर पांडेय

तीन सजावत देश को,सती संत और शूर।
तीन लजावत देश को,कपटी,कायर, क्रूर।

भारत संतों,सतियों और शूर वीरों का देश रहा है। इनके कारण भारत विश्व गुरु बना और विश्व में सम्मानित हुआ।

कपटी,कायर और क्रूर लोगों के कारण भारत पराजित और लज्जित हुआ। यूनान के सुप्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तू ने कभी कहा था कि परम पिता परमेश्वर को जब अपने द्वारा निर्मित सृष्टि के लोगों से वार्तालाप करना होता है तो वह केवल दो को माध्यम बनाता है-या तो वह संतों के मुखारविंद से बोलता है या कवियों के मुखारविंद से।

भारतवर्ष में अनेक संत महात्मा हुए हैं और भविष्य में भी होंगे लेकिन संत रविदास के समकक्ष होंगे या नहीं यह विचारणीय पहलू है।

संत गुरु रविदास भारत के महान संतों में से एक परम संत शिरोमणि रहे हैं, जिन्होंने अपना जीवन समाज सुधार कार्य के लिए समर्पित कर दिया।

समाज से जाति विभेद को दूर करने में रविदास जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वो ईश्वर को पाने का एक ही मार्ग जानते थे और वो है ‘भक्ति’, इसलिए तो उनका एक मुहावरा आज भी बहुत प्रसिद्ध है कि, ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’।

रविदास जी का जन्म

रविदास जी के जन्म को लेकर कई मत हैं। लेकिन रविदास जी के जन्म पर एक दोहा खूब प्रचलित है-

चौदस सो तैंसीस की,माघ सुदी पन्दरास।
दुखियों के कल्याण हित,प्रगटे श्री गुरु रविदास।

इस पंक्ति के अनुसार गुरु रविदास का जन्म माघ मास की पूर्णिमा को रविवार के दिन संवत् 1433 (यानि सन् 1376 ई )को हुआ था।

रविवार के दिन इनका जन्म हुआ, इसीलिए इनका नाम रविदास पड़ा। उत्तर प्रदेश मध्यप्रदेश और राजस्थान में इन्हें रैदास भी कहा जाता है।

हर साल माघ मास की पूर्णिमा तिथि को रविदास जयंती के रूप में मनाया जाता है जो कि इस वर्ष 24 फरवरी 2024 को है। इनका निधन अनुमानतः 1518 में वाराणसी में हुआ।

संत रविदास जी का जन्म 15 वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में गोवर्धन पुर गांव में एक मोची परिवार में हुआ था।

इनकी माता का नाम करमा देवी (कलसा) और पिता का नाम संतोख दास (रग्घू) था। इनके दादा का नाम श्री कालूराम और दादी का नाम श्रीमती लखपति देवी और पत्नी का नाम लोना देवी और पुत्र का नाम विजय दास है।

इनके पिता श्री जाति के अनुसार जूते बनाने का पारंपरिक पेशा करते थे, जो कि उस काल में निम्न जाति का माना जाता था।

लेकिन अपनी सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि के बावजूद भी रविदास जी भक्ति आंदोलन, हिंदू धर्म में भक्ति और समतावादी आंदोलन में एक प्रमुख व्यक्ति के रूप में उजागर हुए।

15 वीं शताब्दी में रविदास जी द्वारा चलाया गया भक्ति आंदोलन उस समय का एक बड़ा आध्यात्मिक आंदोलन था,जो समता मूलक था।

समाज के लिए संत गुरु रविदास का योगदान

संत शिरोमणि श्री गुरु रविदास जी एक महान संत और समाज सुधारक थे। भक्ति, सामाजिक सुधार, मानवता के योगदान में उनका जीवन समर्पित रहा।

धार्मिक योगदान

भक्ति और ध्यान में गुरु रविदास का जीवन समर्पित रहा। उन्होंने भक्ति के भाव से कई गीत, दोहे और भजनों की रचना की, आत्मनिर्भरता, सहिष्णुता और एकता उनके मुख्य धार्मिक संदेश थे।

हिंदू धर्म के साथ ही सिख धर्म के अनुयायी भी गुरु रविदास के प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं। रविदास जी की 41 कविताओं को सिखों के पांचवे गुरु अर्जुन देव ने पवित्र ग्रंथ आदिग्रंथ या गुरुग्रंथ साहिब में शामिल कराया था।

सामाजिक योगदान

समाज सुधार में भी गुरु रविदास जी का विशेष योगदान रहा। इन्होंने समाज से जातिवाद, भेदभाव और सामाजिक असमानता के खिलाफ होकर समाज को समानता और न्याय के प्रति प्रेरित किया।

संत रविदास के विचार धर्म,समाज और मानवता से जुड़े थे। उन्होंने समाज में असमानता, भेद-भाव, उत्पीड़न, उच्छृंखलता और अन्यान्य के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।

उनके विचारों में धर्म और समाज के संबंधों का विस्तार पूर्वक उल्लेख मिलता है। संत रविदास के विचारों के मुख्य संदर्भों में श्रद्धा,सेवा, एकता,नेता, समानता,संयम, आदर्शों का पालन, प्रेम और समझौता शामिल हैं।

वे सभी लोगों के साथ एक जैसे बराबरी की मांग करते थे।उनके अनुयायियों का कहना है कि संत रविदास जी के धर्म के महत्व का सभी लोगों तक पहुंचाने के लिए कई प्रचार यात्राएं भी की थी।

वे एकता,समता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के पोषक थे।सच तो यह है कि आधुनिक भारत के आध्यात्मिक नेपोलियन कहे जाने वाले विवेकानंद, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और संविधान निर्माता डा बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर पर उनके विचारों का गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है।

शिक्षा और सेवा:- गुरु रविदास जी ने शिक्षा के महत्व पर जोर दिया और अपने शिष्यों को उच्चतम शिक्षा पाने के लिए प्रेरित किया।

अपने शिष्यों को शिक्षित कर उन्होंने शिष्यों को समाज की सेवा में समर्थ बनाने के लिए प्रेरित किया। मध्यकाल की प्रसिद्ध संत मीराबाई भी रविदास जी को अपना आध्यात्मिक गुरु मानती थीं।

रविदासजी अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति के तथा अत्यंत दयालु थे वे जूते बनाने का कार्य करते थे ,ऐसा करने में उन्हें बहुत खुशी मिलती थी और वे पूरी लगन तथा परिश्रम से अपना कार्य करते थे।

रविदास का वैशिष्ट्य

उनका जन्म ऐसे समय में हुआ था जब उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में मुगलों का शासन था, चारों ओर अत्याचार, गरीबी, भ्रष्टाचार व अशिक्षा का बोलबाला था।

उस समय मुस्लिम शासकों द्वारा प्रयास किया जाता था कि अधिकांश हिन्दुओं को मुस्लिम बनाया जाए।

संत रविदास की ख्याति लगातार बढ़ रही थी जिसके चलते उनके लाखों भक्त थे जिनमें हर जाति के लोग शामिल थे।

यह सब देखकर एक मुस्लिम ‘सदना पीर’ उनको मुसलमान बनाने आया था। उसका सोचना था कि यदि रविदास मुसलमान बन जाते हैं तो उनके लाखों भक्त भी मुस्लिम हो जाएंगे।

ऐसा सोचकर उनपर हर प्रकार से दबाव बनाया गया था, लेकिन संत रविदास तो संत थे उन्हें किसी हिन्दू या मुस्लिम से नहीं मानवता से मतलब था।

संत रविदासजी बहुत ही दयालु और दानवीर थे। संत रविदास ने अपने दोहों व पदों के माध्यम से समाज में जातिगत भेदभाव को दूर कर सामाजिक एकता पर बल दिया और मानवतावादी मूल्यों की नींव रखी।

रविदासजी ने सीधे-सीधे लिखा कि

रैदास जन्म के कारने, होत न कोई नीच।
नर कूं नीच कर डारि है, ओछे करम की नीच।

यानी कोई भी व्यक्ति सिर्फ अपने कर्म से नीच होता है। जो व्यक्ति गलत काम करता है वो नीच होता है। कोई भी व्यक्ति जन्म के हिसाब से कभी नीच नहीं होता।

संत रविदास ने अपनी कविताओं के लिए जनसाधारण की ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। साथ ही इसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और रेख्ता यानी उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है।

रविदासजी के लगभग चालीस पद सिख धर्म के पवित्र धर्मग्रंथ ‘गुरुग्रंथ साहब’ में भी सम्मिलित किए गए है।

स्वामी रामानंदाचार्य वैष्णव भक्तिधारा के महान संत रहे हैं। संत रविदास उनके शिष्य थे। संत रविदास तो संत कबीर के समकालीन व गुरु भाई माने जाते हैं।

स्वयं कबीरदास जी ने ‘ संतन में रविदास ‘ कहकर इन्हें मान्यता दी है। राजस्थान की कृष्ण-भक्त कवयित्री मीराबाई उनकी शिष्या थीं।

यह भी कहा जाता है कि चित्तौड़ के राणा सांगा की पत्नी झाली रानी उनकी शिष्या बनीं थीं। वहीं चित्तौड़ में संत रविदास की छतरी बनी हुई है।

मान्यता है कि वे वहीं से स्वर्गारोहण कर गए थे। कहते हैं कि वाराणसी में 1540 ई. में उन्होंने देह छोड़ दी थी।

वाराणसी में संत रविदास का भव्य मंदिर और मठ है। जहां सभी जाति के लोग दर्शन करने के लिए आते हैं।

वाराणसी में श्री गुरु रविदास पार्क है, जो नगवा में उनकी स्मृति के रुप में बनाया गया है। ईश्वर के प्रति उनकी भक्ति अभिन्नता और अद्वैत की भक्ति है।

उनका यह पद उनकी इसी भावना का डिम डिम महाघोष है:-

अब तो राम नाम रट लागी।
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी।
जाकी अंग अंग वास समानी।
प्रभु जी तुम घन वन हम मोरा।
जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती।

जाकी जोत बरै दिन राती।
प्रभु जी तुम मोती हम धागा।
जैसे सोनहि मिलत सोहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भक्ति करै रैदासा।

लेखक : रांची विश्वविद्यालय के पीजी हिन्दी डिपार्टमेंट के पूर्व विभागाध्यक्ष हैं।

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