राज्यसभा चुनाव: धीरज की राह में रोड़ा, समीर भी आलाकमान के भरोसे

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रांची। राज्यसभा चुनाव का बिगुल बजते ही झारखंड की सियासत एक बार फिर गरमाने लगी है। आगामी लोकसभा चुनाव से ठीक पहले होने वाले राजज्यसभा चुनाव को लेकर विभिन राजनीतिक दलों में समीकरण बिठाये जाने लगे हैं।

आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतना चाहती है, ताकि केंद्र से भाजपा की सरकार को हटाया जा सके।

परंतु यहां जो सीन बन रहे हैं, उसके मुताबिक लोकसभा चुनाव से पहले राज्यसभा में ही उसका नुकसान न हो जाये।

झारखंड से राज्यसभा सांसद धीरज साहू का राज्यसभा पहुंचना भले ही आसान दिख रहा है, लेकिन अंदरूनी हालात इसके उलट हैं।

झारखंड की राजनीतिक परिस्थितियां अभी बदली हुई हैं। धीरज साहू को लेकर कहा जा रहा है कि इस बार उनकी राह में बड़ा रोड़ा है। इस बार उनके चुनाव लड़ने पर ग्रहण लग सकता है।

बताया जा रहा है कि धीरज साहू के रास्ते की कोई अगर अड़चन बन रहा है तो वह है गांडेय के इस्तीफा दे चुके झारखंड मुक्ति मोर्चा के पूर्व विधायक सरफराज अहमद।

ऐसा इसलिए कि पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फंसने के आसार को देखते हुए झामुमो ने उनसे इस्तीफा दिलवा दिया था।

इसके पीछे मंशा यह थी कि विपरीत परिस्थिति उत्पन्न होने पर हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन को उप चुनाव में वहां लड़ाया जा सके।

इस रास्ते से कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री के पद पर बिठाने का मार्ग प्रशस्त करने की कोशिश की गई थी। जैसा की अंदेशा था, हेमंत सोरेन कथित जमीन घोटाले में फंसे, उन्हें ईडी ने गिरफ्तार भी कर लिया और उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी।

परंतु अंतिम समय में आंकलन में गड़बड़ा जाने के कारण कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बिठाया जा सका और चंपाई सोरेन झारखंड के नये मुख्यमंत्री बन गये।

इस प्रकार सरफराज अहमद का इस्तीफा निरर्थक हो गया। पर जैसा कि उन्हें इस्तीफा देने के पहले आश्वस्त किया गया था, उसके अनुसार इसकी भरपाई अब एक ही तरीके से हो सकती है कि उन्हें राज्यसभा भेज दिया जाये।

अब चूंकि यह आश्वासन हेमंत सोरेन ने उन्हें दिया था, इसलिए झामुमो इस वादे को रूपा करने में कोई कोर कसर छोड़ने वाली नहीं है। और तो और झारखंड से अपना प्रत्याशी राज्यसभा भेजने में झामुमो पूरी तरह सक्षम भी है।

झामुमो यदि इस बात पर अड़ जाती है, तो कांग्रेस चाह कर भी कुछ नहीं कर पायेगी। इस प्रकार समीर उरांव को राज्यसभा सांसद का पद छोड़ना पड़ सकता है।

वहीं, दूसरी तरफ समीर उरांव के राज्यसभा जाने में वैसे तो कोई कठिनाई नहीं है। लेकिन हाल के दिनों में भाजपा की रणनीति को देखते हुए कुछ भी आकलन करना जल्दबाजी होगी।

इस सीट के लिए भाजपा ने क्या तय कर रखा है, यह तो शीर्ष नेतृत्व ही बता सकता है। समीर उरांव को दोबारा राज्यसभा भेजना भाजपा के चुनावी गणित पर ही निर्भर है।

पिछले कुछ समय से भाजपा की राजनीति शीर्ष नेतृत्व पर टिक गयी है। इसलिए अब समीर उरांव का दोबारा राज्यसभा जाना शीर्ष नेतृत्व पर ही निर्भर है।

बता दें कि समीर उरांव भाजपा एसटी मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। 23 मार्च 2018 को वह 78 में से 27 प्रथम वरीयता वोट प्राप्त करके राज्यसभा के लिए चुने गए थे।

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