सुशोभित
जब मैं गांधी पर लिख रहा था, तब अकसर मुझे इस आशय के मैसेज मिलते थे कि गांधी ने इस विषय पर ऐसी बात कही है, आप इससे सहमत कैसे हो सकते हैं?
मैं उनसे पूछता, आपसे किसने कहा कि मैं सहमत हूँ? तब वो पूछते कि फिर आप उन पर लिखते क्यों हैं?
उन मित्रों को किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करने और उसका अंधानुकरण करने का अंतर नहीं पता था। यह दृष्टिकोण की बुनियादी भूल है।
इसी तर्ज़ पर एक मित्र ने पिछले दिनों मुझसे पूछा कि आप मार्क्स की बात करते हैं और शाकाहार की भी प्रस्तावना रखते हैं, पर मार्क्सवादी लोग तो जमकर माँसाहार करते हैं।
यह विरोधाभास कैसे? मैंने उनसे कहा कि अव्वल तो जो लोग ख़ुद को मार्क्सवादी बतलाते हैं, ज़रूरी नहीं कि वे मार्क्सवादी हों ही।
बहुत सारे लोग मार्क्सवाद को समझे बिना ही फ़ैशनेबल कम्युनिस्ट बन जाते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे बहुत सारे लोग ख़ुद को हिन्दू समझते हैं लेकिन वेदान्त की उन्हें समझ नहीं है और वेदान्त की समझ हुए बिना कोई हिन्दू हो नहीं सकता।
पुराणवादी मेरी दृष्टि में प्रक्षिप्त और विपथ हिन्दू है, औपनिषदिक भावबोध वाला ही सच्चा सनातनी हो सकता है।
दूसरे, किसी जाति, वर्ग या समुदाय को कमोडिटी-स्टेटस प्रदान करके उसका अनवरत शोषण होता रहे, इसका प्रखर-विरोध ही मार्क्सवाद की बुनियादी विचार-प्रक्रिया है।
उसमें स्पेसिफिकली मार्क्स ने सर्वहारा पर फ़ोकस किया था, मैं उसे पशुओं पर ले आता हूँ। मैं कहता हूँ, आप पशुओं को चैतन्य-प्राणी के बजाय वस्तु की तरह ट्रीट नहीं कर सकते और उनका बेखटके शोषण नहीं कर सकते।
आज अगर मार्क्स होते तो मैं उनसे भी यही कहता और उनकी स्वीकृति-सहमति की प्रतीक्षा नहीं करता। अन्याय का विरोध मार्क्सवाद के मूल में है और जो अन्याय का विरोध नहीं करता, वह मेरी नज़र में मार्क्सवादी नहीं हो सकता।
अगर सर्वहारा पशुओं के प्रति बूर्ज्वा है तो उसे इस शोषण को वैसे ही त्यागना होगा, जैसे कि वह अपेक्षा करता है कि बूर्ज्वा सर्वहारा का शोषण न करे।
तीसरे, सर्वहारा और पशुओं में अंतर यह है कि सर्वहारा अंतत: मनुष्य हैं, उन्हें एजुकेट किया जा सकता है और उन्हें क्रांति के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
मार्क्स को लगता था कि बूर्ज्वा से यह उम्मीद करना बेकार है कि वह अपने वर्चस्व को स्वयं ही त्याग देगा, सर्वहारा को उससे यह छीनना पड़ेगा।
फ़ार्म-एनिमल्स के मामले में बात यह नहीं है कि हम उन्हें समझा-बुझाकर क्रांति के लिए राज़ी कर लेंगे। वो बेचारे इस पृथ्वी की सबसे प्रताड़ित, नियति-वंचति जाति हैं।
वो आजीवन बंधक बन चुके हैं और पूरी तरह से मनुष्यों की दया पर निर्भर हैं। इसमें तो जो पशुओं का शोषण कर रहे हैं, उनकी ही अंतश्चेतना को निरंतर झकझोरकर और उनके विवेक को जगाकर वस्तुस्थिति में परिवर्तन लाना होगा। वही काम मैं अनवरत कर रहा हूँ।
गांधी या मार्क्स या रजनीश किसी अन्य पर लिखने का अर्थ यह नहीं है कि लेखक इनसे सौ प्रतिशत सहमत हो गया है, इनकी बातों को पत्थर की लकीर मान बैठा है और इनका अंधभक्त बन चुका है।
ये सभी व्यक्ति नहीं विचार-प्रक्रियाएँ हैं। विचार-प्रक्रियाओं का महत्त्व व्यक्ति से अधिक होता है। और विचार-प्रक्रियाएँ प्रगतिशील होती हैं, वे अनवरत आगे बढ़ती रहती हैं, अपने में सुधार-संशोधन-परिमार्जन करती रहती हैं।
मेरे सामने ऐसी कोई गांधीवादी या मार्क्सवादी या रजनीशी या वेदान्ती आचार-संहिता नहीं है, जिसका मुझे पालन करना ही है। अपने विवेक के अनुसार जहाँ से, जिससे, जो मूल्यवान मिल जायेगा, ग्रहण कर लूँगा।
किन्तु जिन्होंने बचपन से ही यही सीखा है कि यह अपना धर्म है, इसको आँख मूँदकर मानो, यह अपना भगवान है, इसकी पूजा करो, यह अपना गुरु है, इसके चरणों में लेट जाओ, यह अपनी पार्टी है, चाहे जो हो इसी का समर्थन करो, और यह अपना नेता है, यह चाहे जितनी नंगई और नीचता करे, हमेशा इसी को वोट दो- वो स्वतंत्र, प्रगतिकामी और सत्यान्वेषी विचार-प्रक्रियाओं की बातों को भला कैसे समझेंगे?
लेखक : देश के जाने-माने पत्रकार हैं।
इसे भी पढ़ें








