ll वैदिक पंचांग ll [Vedic Panchang]

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दिनांक – 18 सितम्बर 2024
दिन – बुधवार
विक्रम संवत – 2081
शक संवत -1946
अयन – दक्षिणायन
ऋतु – शरद ॠतु
मास – भाद्रपद
पक्ष – शुक्ल
तिथि – पूर्णिमा सुबह 08:04 तक तत्पश्चात प्रतिपदा
नक्षत्र – पूर्वभाद्रपद सुबह 11:00 तक तत्पश्चात उत्तरभाद्रपद
योग – गण्ड रात्रि 11:29 तक तत्पश्चात वृद्धि
राहुकाल – दोपहर 12:33 से दोपहर 02:04 तक
सूर्योदय -05:37
सूर्यास्त- 06:03
दिशाशूल – उत्तर दिशा में

व्रत पर्व विवरण –

भाद्रपदी पूर्णिमा,संयासी चतुर्मास समाप्त,प्रतिपदा का श्राद्ध,पंचक,प्रतिपदा क्षय तिथि,खंडग्रास चंद्रग्रहण (भारत के पश्चिमी भाग मे छाया ग्रहण के रूप मे दिखेगा,अन्य भागो मे नही दिखेगा | पूरे भारत मे नियम पालनीय नही है)

विशेष – पूर्णिमा एवं व्रत के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)

नही है पैसा तो निश्चिंत होकर इस विधि से श्राद्ध पक्ष मे पूर्वजो को संतुष्ट कर उनका शुभ आशीर्वाद जरूर पाएं

श्राद्ध में पालने योग्य नियम

17 सितम्बर 2024 मंगलवार से महालय श्राद्ध आरम्भ हो गया है।

श्रद्धा और मंत्र के मेल से पितरों की तृप्ति के निमित्त जो विधि होती है उसे ‘श्राद्ध’ कहते हैं।

हमारे जिन संबंधियों का देहावसान हो गया है, जिनको दूसरा शरीर नहीं मिला है वे पितृलोक में अथवा इधर-उधर विचरण करते हैं, उनके लिए पिण्डदान किया जाता है।

बच्चों एवं संन्यासियों के लिए पिण्डदान नहीं किया जाता। विचारशील पुरुष को चाहिए कि जिस दिन श्राद्ध करना हो उससे एक दिन पूर्व ही संयमी, श्रेष्ठ ब्राह्मणों को निमंत्रण दे दे। परंतु श्राद्ध के दिन कोई अनिमंत्रित तपस्वी ब्राह्मण घर पर पधारें तो उन्हें भी भोजन कराना चाहिए।

भोजन के लिए उपस्थित अन्न अत्यंत मधुर, भोजनकर्ता की इच्छा के अनुसार तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किया हुआ होना चाहिए।

पात्रों में भोजन रखकर श्राद्धकर्ता को अत्यंत सुंदर एवं मधुर वाणी से कहना चाहिए कि ‘हे महानुभावो ! अब आप लोग अपनी इच्छा के अनुसार भोजन करें।’

श्रद्धायुक्त व्यक्तियों द्वारा नाम और गोत्र का उच्चारण करके दिया हुआ अन्न पितृगण को वे जैसे आहार के योग्य होते हैं वैसा ही होकर मिलता है। (विष्णु पुराणः 3.16,16)

श्राद्धकाल में शरीर, द्रव्य, स्त्री, भूमि, मन, मंत्र और ब्राह्मण-ये सात चीजें विशेष शुद्ध होनी चाहिए।
श्राद्ध में तीन बातों को ध्यान में रखना चाहिएः शुद्धि, अक्रोध और अत्वरा (जल्दबाजी नही करना)।
श्राद्ध में मंत्र का बड़ा महत्त्व है।

श्राद्ध में आपके द्वारा दी गयी वस्तु कितनी भी मूल्यवान क्यों न हो, लेकिन आपके द्वारा यदि मंत्र का उच्चारण ठीक न हो तो काम अस्त-व्यस्त हो जाता है।

मंत्रोच्चारण शुद्ध होना चाहिए और जिसके निमित्त श्राद्ध करते हों उसके नाम का उच्चारण भी शुद्ध करना चाहिए।

जिनकी देहावसना-तिथि का पता नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन करना चाहिए।

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