धर्म-कर्म में दान-दक्षिणा का महत्व जानें, पुण्य फल के लिए क्यों है जरूरी ? [Know the importance of charity and dakshina in religious activities, why is it necessary for virtuous results?]

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रांची। बिना दक्षिणा के नहीं मिलता धार्मिक कार्यों का पूरा फल। इस धारणा का ठोस कारण है। दान-दक्षिणा की महिमा से धर्म ग्रंथ भरे हुए हैं। कहा गया है कि देने से धन घटता नहीं बढ़ता है।

वैसे भी धार्मिक कृत्य में मानसिक स्थिति का सर्वाधिक महत्व है। उसी आधार पर फल मिलता है।

अब यदि कोई इसमें कंजूसी करता या हक मारने की सोच रखता है तो उसे फल मिलना अत्यंत कठिन है। क्योंकि श्रम कराकर बदले में कुछ नहीं या कम देने से आचार्य की मानसिक शक्ति यजमान के प्रतिकूल हो जाती लेना है।

अर्थात आचार्य शरीर से तो आपके लिए काम करता है लेकिन मन से विरुद्ध होता है। फिर फल कैसे मिलेगा?

वेद के अनुसार जो देता है, उसे देवता और अधिक देते हैं। जो नहीं देता, देवता उसका छीनकर दानियों को दे देते हैं।

यजुर्वेद में दक्षिणा का महत्व

यजुर्वेद कहता है दक्षिणा से श्रद्धा प्राप्त होती है। श्रद्धा से सत्य (यहां चरम लक्ष्य का भाव है) की प्राप्ति होता है। क्रम है, व्रत के बाद दीक्षा। दीक्षा के बाद दक्षिणा।

दक्षिणा के बाद श्रद्धा और उसके बाद सत्य (परम लक्ष्य) प्राप्त होता है। अर्थात इस पूरी प्रक्रिया में दक्षिणा मध्य में है।

एक बार दीक्षित होकर आगे बढ़ गए। बाद में दक्षिणा में लोभ किया या कंजूसी की तो मार्ग भ्रष्ट होना तय है। इसी कारण विद्वानों, गुरुओं और आचार्यों को दक्षिणा देने की प्रशंसा की गई है।

सामान्य रूप से भी देखें तो सच्चे मन से उचित दक्षिणा देने से अपने आचार्य में श्रद्धा बढ़ती है।

आचार्य भी दक्षिणा पाकर अपनी अन्य सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर शिष्य या यजमान के कल्याण के लिए और उत्साह से लग जाते हैं। इस तरह अंततः उसे लक्ष्य की प्राप्ति करा देते हैं।

दक्षिणा कितनी और कैसी हो

बिना दक्षिणा के नहीं मिलता फल में जानें कि यह कितनी और कैसी हो? इस बारे में शास्त्र का स्पष्ट मत है कि वह यथाशक्ति हो। न यजमान की शक्ति से कम और न अधिक।

सनातन धर्म की संरचना ही ऐसी है कि अपरिग्रही ब्राह्मण, गुरु, पुरोहित, ज्योतिषी, आचार्य आदि निःस्वार्थ रूप से समाज की सेवा करें।

बदले में समाज उन्हें अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा दे। ताकि वे सांसारिक चिंता से मुक्त होकर काम करते रहें। कालांतर में यजमान के मन में कृपणता आई।

आचार्य भी पथभ्रष्ट होने लगे। परिणामस्वरूप सनातन व्यवस्था की कड़ी टूट गई। इस कारण योग्य पंडित इस कार्य से दूर होकर दूसरा पेशा चुनने लगे।

जो इसमें रुचि रखते भी हैं, उन्होंने ज्ञान को अपने तक सीमित रखना शुरू कर दिया। इससे सनातन ज्ञान का ह्रास होने लगा। धंधेबाजों ने इसका लाभ उठाया। उनके पाखंड ने समाज के पतन में निर्णायक भूमिका निभाई।

कमी पूजा-पाठ, हवन व मंत्र में नहीं, करने और कराने वाले मे

आर्थिक संकट के कारण इस क्षेत्र में सक्रिय लोगों में विद्वान और सक्षम लोगों का घोर अभाव है। ऐसे लोग किसी को गुमराह करके पैसे नहीं वसूल सकते हैं। यजमान उन्हें देने में कंजूसी करते हैं।

ऐसे में अधिकतर ने इस कार्य से किनारा कर लिया। सक्रिय लोगों में अधिकतर अयोग्य हैं। कुछ ठग और धंधेबाज हैं। वे यजमान को डराकर पैसे वसूल लेते हैं।

स्वाभाविक है कि ऐसे लोगों के बल पर पूजा-पाठ, हवन और मंत्र से फल नहीं मिल सकता है। ऐसे में कई लोग अब इसे ढकोसला और पांखड कहते हैं।

वे नहीं जानते कि इसके लिए जिम्मेदार वे स्वयं हैं। विचार करें कि सालों तक घंटों परिश्रम कर ज्ञान अर्जित करने वाला पंडित मुफ्त में या नाममात्र की दक्षिणा लेकर काम क्यों करेगा?

क्यों अपने अन्य कामकाज छोड़कर आपके लिए समय बर्बाद करेगा। यदि कर भी ले तो अपना घर कैसे चलाएगा?

मनु स्मृति की व्यवस्था

महाराजा मनु ने इसे हजारों साल पहले समझ लिया था। सनातन धर्म और ज्ञान के हित में उन्होंने कहा था कि बिना दक्षिणा के नहीं मिलेगा फल। मनु स्मृति में इस बारे में स्पष्ट व्यवस्था को पढ़ें।

उन्होंने लिखा है कि “कम धन वाला यज्ञ न करे। वह अन्य पुण्य कर्मों को करे। कम दक्षिणा देकर यज्ञ नहीं करना चाहिए।

कम दक्षिणा देकर यज्ञ कराने से यज्ञ की इंद्रियां जातक के यश, स्वर्ग, आयु, कीर्ति, प्रजा और पशुओं का नाश करती हैं।” दूसरे स्थान पर कहा है “दक्षिणाहीन यज्ञ दीक्षित को नष्ट कर देता है।”

वेद में भी कहा गया है,“प्रयत्न से उत्तम कर्म करने वाले के लिए जो योग्य दक्षिणा देता है, अग्नि उस मनुष्य की चारों ओर से सुरक्षा करता है।”

ऐसी बातें ऋग्वेद, अथर्ववेद, ब्रह्मवैवर्त पुराण, स्कंद पुराण में भी है। अपना हित चाहने वाले इसका ध्यान रखें तो उन्हें फल अवश्य मिलेगा।

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