ईरान ने फिलिस्तीन के पक्ष को कमज़ोर किया है

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सुशोभित

ऊपर से देखने पर तो लगता है कि गाज़ा-युद्ध के बहाने दुनिया में जो यहूदी-मुस्लिम मनोवैज्ञानिक टकराव चल रहा है, उसमें इज़राइल पर मिसाइलें दाग़कर ईरान ने मुस्लिम पक्ष और उससे हमदर्दी रखने वालों का दिल जीत लिया है, लेकिन ऐसा नहीं है।

वास्तव में, ईरान ने फिलिस्तीन के पक्ष को कमज़ोर किया है और वैश्विक-सहानुभूति को फिर से इज़राइल के पाले में ला दिया है, जिसे कि वह गाज़ा में मानवाधिकारों के निरंकुश दमन से गँवा चुका था।

एक बार फिर से यथास्थिति 7 अक्टूबर वाली जगह पर आ गई है, जिसमें इज़राइल- यानी मध्य-पूर्व में कट्टर दुश्मनों से घिरा इकलौता यहूदी-राष्ट्र- ग़ैर-जायज़ हमलों का शिकार हुआ है।

अब वह चाहे तो इस पर करारा मिलिट्री रिस्पॉन्स दे सकता है, अलबत्ता पूरी दुनिया मन ही मन यह दुआ कर रही है कि वो ऐसा न करे।

अमेरिका ने ईरानी प्रहार से इज़राइल की रक्षा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और इसे इज़राइल की जीत क़रार दिया था, लेकिन अब बाइडन ने नेतन्याहू से कह दिया है कि अगर आप ईरान पर धावा बोलोगे तो हम आपका साथ नहीं देंगे।

ईरान ने इज़राइल पर 300 से ज़्यादा मिसाइलें और ड्रोन दाग़े, लेकिन इज़राइल को खरोंच तक न आई।

इसने ईरान के द्वारा दशकों से दी जा रही गीदड़भभकियों की कलई खोल दी है। उसे नख-दंतहीन सिद्ध किया है।

इज़राइल ने गाज़ा में युद्ध 7 अक्टूबर की उस घटना के बाद छेड़ा था, जिसमें हमास ने सीधे इज़राइली धरती पर हमला बोला था।

लेकिन ऐसा ईरान के साथ नहीं था। उसकी धरती पर कोई प्रहार नहीं किया गया था। सीरिया में उसके कोन्सुलेट पर हमला हुआ था, जिसके बारे में माना जाता है कि वह इज़राइल ने किया है, अलबत्ता इज़राइल ने इसे स्वीकारा नहीं था, न इससे इनकार किया था।

लेकिन इससे ईरान की सम्प्रभुता भंग नहीं हुई थी, उस पर एक कूटनीतिक आक्रमण भर था।

इसका प्रत्युत्तर कूटनीतिक दबाव बनाना था, जो पहले ही पूरी दुनिया में नैरेटिव की लड़ाई हार रहे इज़राइल पर भारी पड़ता।

लेकिन उसने इज़राइल पर मिसाइलें दाग़कर न केवल अपनी कमज़ोरियों को उजागर कर दिया, इज़राइल को भी नैरेटिव की क़ैद से बरी करके विक्टिम होने का डिविडेंड दिला दिया। और इससे गाज़ा में मुसीबतें झेल रहे फिलिस्तीनियों को रत्तीभर भी राहत नहीं मिली है।

वास्तव में यह कहना भी सरलीकरण होगा कि गाज़ा-युद्ध के पीछे एक सूक्ष्म यहूदी-मुस्लिम मनोवैज्ञानिक टकराव है, क्योंकि मध्य-पूर्व में इस्लामिक जगत भी शिया और सुन्नी ताक़तों में विभक्त है।

ईरान ख़ुद को शिया-वर्ल्ड का लीडर समझता है। लेबनान, यमन, सीरिया और अब- सद्दाम हुसेन के बाद वाला इराक़ भी उसके प्रभाव के क्षेत्र में है।

लेकिन सऊदी अरब, यूएई और जॉर्डन उसके सहयोगी नहीं हैं। वास्तव में, ईरान द्वारा दाग़ी गई 300 से ज़्यादा मिसाइलों में से 99 प्रतिशत को इंटरसेप्ट करने में इज़राइल की जॉर्डन ने ख़ासी मदद की थी। जॉर्डन इज़राइल से शांति का क़रारनामा करके बैठा है।

ईरान अभी तक लेबनान के हिज़बुल्ला, यमन के हूतियों और शिला मिलिशियाओं की मदद से इज़राइल- और प्रकारान्तर से अमेरिका- के खिलाफ़ प्रॉक्सी-वॉर छेड़े हुए था।

इस गुरिल्ला शैली के संघर्ष में वह यदा-कदा छोटी-मोटी लड़ाइयाँ जीत लेता था। लेकिन इज़राइल पर नाकाम प्रहार करके उसने अपनी सैन्य-दुर्बलता को ज़ाहिर कर दिया है।

गेंद अब इज़राइल के पाले में है। और इज़राइल अगर समझदार होगा तो काउंटर-अटैक नहीं करेगा और नैरेटिव की लहर पर सवार हो जायेगा।

इज़राइल का फ़ोकस टू-स्टेट सोल्यूशन पर होना चाहिए। सनद रहे कि हमास का प्रभाव-क्षेत्र गाज़ा में है, वेस्ट बैंक में नहीं।

इज़राइल हमास के ख़ात्मे के बाद गाज़ा में पैलेस्टाइन अथॉरिटी की हुकूमत इस शर्त पर बनवा सकता है कि आइंदा से इस धरती से हमारे मेनलैंड पर कोई हमला नहीं होना चाहिए।

दोनों पक्षों में सुलह के लिए यह बुनियादी शर्त होगी। लेकिन अगर फिलिस्तीनी इज़राइल का नामो-निशां मिटाने की जिद पर अड़े रहेंगे तो अपना ही नुक़सान करेंगे।

कारण, इज़राइल वो ज़मीन छोड़कर अब कहीं जाने नहीं वाला है। वहाँ के यहूदी अकसर कहते हैं कि हमारा सबसे बड़ा हथियार यह है कि हमारे पास रहने के लिए कोई और मुल्क है ही नहीं, इसलिए अब जीना भी यहीं है और मरना भी यहीं है।

और उनकी तैयारी जीवित रहने के लिए ज़्यादा है। साथ-साथ जीने की शर्त पर इज़राइली-फिलिस्तीनी राज़ी हो जाएँ तो सुलह मुमकिन है।

7 अक्टूबर के हमास के हमले के बाद आज गाज़ा पहले से बेहतर स्थिति में नहीं है और 13 अप्रैल के ईरानी हमले के बाद भी नहीं होगा।

इस बात को फिलिस्तीनी जितनी जल्दी समझ सकें, उतना बेहतर।

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