चैत्र नवरात्र के साथ ही भारतीय नव वर्ष की शुरुआत, जानिये क्या है विक्रम संवत और क्या है इसका महत्व

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भारतीय नव वर्ष की शुरुआत आज से हो गयी है। विक्रम संवत के अनुसार चैत्र प्रतिपदा से ही हिंदू नव वर्ष की शुरुआत होती है।

भारतीय नव वर्ष के मौके पर आज आपसे हम साझा करेंगे विक्रम संवत से जुड़ी जानकारी।

दरअसल, विक्रम संवत एक कैलेंडर है। उज्जैन के सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा लगभग 1279 वर्ष पूर्व विक्रम संवत की शुरुआत की गई थी।

विक्रम संवत के अनुसार ही भारत के सांस्कृतिक मूल्य जुड़े हुए हैं। चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से नव वर्ष मनाया जाता है।

‘विक्रम संवत’ के उद्भव एवं प्रयोग के विषय में विद्वानों में मतभेद है। मान्यता है कि सम्राट विक्रमादित्य ने ईसा पूर्व 57 में इसका प्रचलन आरम्भ कराया था।

फ़ारसी ग्रंथ ‘कलितौ दिमनः’ में पंचतंत्र का जिक्र है, जिसमें विक्रम संवत की बात कही गयी है। विद्वानों ने सामान्यतः ‘कृत संवत’ को ‘विक्रम संवत’ का पूर्ववर्ती माना है।

वैसे तो फाल्गुन माह के समाप्त होते ही नववर्ष प्रारंभ हो जाता है। पर कृष्ण पक्ष के बाद चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में जिस दिन सूर्योदय के समय प्रतिपदा होती है उसी दिन से नवसंवत्सर प्रारंभ होना माना जाता है।

इसी दिन को भारत के अन्य हिस्सा में गुड़ी पड़वा सहित अन्य कई नामों से जाना जाता है।

विक्रम संवत जब प्रारंभ नहीं हुआ था तब युधिष्ठिर संवत, कलियुग संवत और सप्तर्षि संवत प्रचलित थे।

सप्तर्षि संवत की शुरुआत 3076 ईसवी पूर्व हुई थी जबकि कलियुग संवत की शुरुआत 3102 ईसवी पूर्व हुई थी। इन सभी में एक चीज कॉमन है कि सबकी शुरुआत चैत्र प्रतिपदा में ही होती है।

कलयुग संवत्, सप्तर्षी संवत और युधिष्ठिर संवत में कई खामियां थी। इस कारण विक्रम संवत प्रचलित हुआ। यह एकदम सटीक माना जाता है।

इसमें वार, नक्षत्र और तिथियों का स्पष्टिकरण किया गया है। इसमें पंचांग की बातों के साथ ही बृहस्पति वर्ष की गणना को भी शामिल किया गया है।

विक्रम संवत प्रारंभ होने की कई मान्यताएं हैं। मुख्य रूप से सम्राट विक्रमादित्य को ही इसका जनक माना गया है।

विक्रमादित्य न्यायप्रिय थे। अपनी प्रजा के हित का ख्याल रखते थे। विक्रमादित्य के काल में उज्जैन सहित भारत के एक बड़े भू-भाग पर विदेशी शासकों का शासन था। वे काफी क्रूर थे।

विक्रमादित्य ने प्रजा को उनसे मुक्ति दिलायी और अपना शासन स्थापित किया। इसी विजय की स्मृति के रूप में विक्रमादित्य ने विक्रम संवत पंचांग का निर्माण करवाया था।

अनेक विद्वान विक्रम संवत को उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा ही प्रवर्तित मानते हैं। इस संवत के प्रारंभ की पुष्टि ज्योतिर्विदाभरण ग्रंथ से होती है,.. जो 3068 कलि अर्थात 34 ईसा पूर्व में लिखा गया था।

इसके अनुसार विक्रमादित्य ने 3044 कलि अर्थात 57 ईसा पूर्व विक्रम संवत चलाया। इसके अलावा तीसरी सदी के बरनाला के स्तंभ, जिस पर अंकित लेख से भी यह स्पष्ट होता है कि विक्रम संवत कब से प्रचलित है।

विक्रम संवत अनुसार विक्रमादित्य आज से 2294 वर्ष पूर्व हुए थे। विक्रमादित्य का नाम विक्रम सेन था।

विक्रम वेताल और सिंहासन बत्तीसी की कहानियां महान सम्राट विक्रमादित्य से ही जुड़ी हुई है।

कलि काल के 3000 वर्ष बीत जाने पर 101 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य का जन्म हुआ और उन्होंने 101 साल शासन किया।

तो ये तो हुई विक्रम संवत के उदभव की कहानी।

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