साहस है तो ‘उनके’ मज़हब की भी आलोचना करके दिखाइये!

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सुशोभित

जब भी आप धार्मिक अंधविश्वास और कुरीतियों की आलोचना में कोई लेख लिखते हैं, टिप्पणियों में एक बात अवश्य कही जाती है-

“साहस है तो ‘उनके’ मज़हब की भी आलोचना करके दिखाइये!”

तो आइये, अब इस वाक्य के पीछे निहित विचार-प्रक्रिया और तर्क-प्रणाली की मीमांसा करते हैं।
सबसे पहली बात।

अगर आप अपने धर्म की औचित्यसिद्धि ‘उनके’ मज़हब से तुलना करके ही कर पाते हैं तो जब ‘उनका’ मज़हब नहीं था- यानी यही कोई 1400 वर्ष पूर्व तक- तब आप अपने धर्म की औचित्यसिद्धि किससे तुलना करके करते थे?

क्योंकि धर्म की आलोचना तो तब भी की जाती थी। बुद्ध तो 2500 वर्ष पूर्व आलोचना कर गए। तब उन्हें क्या उलाहना दिया गया होगा? किसकी आड़ लेकर बचा जाता होगा?

दूसरी बात, जब कोई आपके धर्म की प्रशंसा करता है, तब तो आप उसे मंत्रमुग्ध भाव से ग्रहण कर लेते हैं।

तब यह नहीं कहते कि “‘उनके’ मज़हब की प्रशंसा भी तो कीजिये! अकेले हमारी ही क्यों करते हैं?”

जब प्रशंसा पूरी की पूरी स्वीकार की जाती है, तो आलोचना में आपको दूसरे की पार्टनरशिप क्यों चाहिए?

तीसरी बात, जब कोई आलोचना अतार्किक और तथ्यहीन होती है तो आप उसका तुरंत ही आत्मविश्वास से खण्डन करते हैं।

“साहस है तो ‘उनके’ मज़हब की भी आलोचना करके दिखाइये!”- यह बात कही ही तब जाती है, जब आलोचना का खण्डन करने की स्थिति नहीं रह जाती।

यानी यह तर्क तब दिया जाता है, जब धर्मालु एक ऐसी स्थिति में फँस जाता है, जहाँ से बच निकलने की उसे कोई राह नहीं दिखती।

तब उसकी रुचि इसमें रह जाती है कि औरों की भी आलोचना की जाए। गोया कि, मेरी पूँछ कटी तो उनकी भी कटे। मैं चोर हूँ, तो वो भी चोर हैं। हम सब चोर हैं। हम अकेले चोर नहीं हैं!

इसका यह मतलब है कि “साहस है तो ‘उनके’ मज़हब की भी आलोचना करके दिखाइये!” में इस बात की आत्मस्वीकृति निहित है कि हाँ, हमारे धर्म में समस्याएँ हैं, जो आलोचना की पात्र हैं, लेकिन अकेले हमारी ही क्यों, ‘उनकी’ भी आलोचना कीजिये।

ये वही उदात्त भावदशा है, जिसमें डूबते-उतराते हुए उन्नीस सौ पचहत्तर के दिव्य वर्ष में अमिताभ बच्चन ने वह कालजयी मंत्र कहा था- “जाओ, पहले ‘उनका’ साइन लेकर आओ!”

लेकिन इस तर्क के साथ समस्या यह है कि यह जाने-अनजाने आपको ‘उनके’ तल पर ला देता है, जिनसे आपने स्वयं को श्रेष्ठ समझते हुए ही अपना पूरा नैरेटिव खड़ा किया था।

यानी आप आजीवन यह कहते रहे कि हमारा धर्म ‘उनसे’ श्रेष्ठ है, हमारी संस्कृति ‘उनसे’ श्रेष्ठ है, हमारा दर्शन ‘उनसे’ श्रेष्ठ है, लेकिन जैसे ही आप किसी बिंदु पर फँसे, आप कहने लगे कि ‘उनकी’ भी तो आलोचना कीजिये।

ये कहकर आपने इस बात को मान लिया कि हम सब एक थैली के चट्टे-बट्टे हैं, हम ‘उनसे’ श्रेष्ठ वग़ैरा नहीं हैं, उनके जैसे ही हैं।

तब क्या हो अगर- और यह रामबाण है!- जिस व्यक्ति से आपने यह कहा है कि “साहस है तो ‘उनके’ मज़हब की भी आलोचना करके दिखाइये!”, उसने न केवल ‘उनके’ मज़हब की भी आलोचना कर रखी हो, बल्कि आपके धर्म से कुछ ज़्यादा ही कर रखी हो और उलटे वह तो इसके लिए बदनाम हो- और अगर तब वह व्यक्ति आपके सामने ‘उनके’ मज़हब की आलोचना में लिखे गए अपने लेखों की कतरनें रख दे, तब आप कौन-सी बगलें झाँकने लगेंगे?

और क्या तब आप यह कहकर उस व्यक्ति से क्षमायाचना करेंगे कि माफ़ कीजिये, हम तो समझे थे कि आप एक ही पक्ष की मलामत करते हैं, लेकिन आपके दिए प्रमाणों से यह स्पष्ट हुआ है कि आप तो निष्पक्ष-भाव से और स्वतंत्र-बुद्धि से सभी प्रकार की धार्मिक कुरीतियों को न्यायपूर्वक प्रश्नांकित करते हैं और इसलिए हम कान पकड़कर उठक-बैठक करते हैं और आपसे क्षमा माँगते हैं कि भूल हुई, आगे से हम ऐसा नहीं पूछेंगे?

अगर इन तमाम परिप्रेक्ष्यों को समझने की और उन पर सोच-विचार करने की आपकी तैयारी नहीं है तो आपको कभी भी किसी स्वतंत्रचेता बौद्धिक- जो कि इन पंक्तियों का लेखक है- से यह कहने की जुर्रत नहीं करनी चाहिए कि “साहस है तो ‘उनके’ मज़हब की भी आलोचना करके दिखाइये!”

2013 के बाद जन्मे बालकों ने कभी सचिन तेंडुलकर को खेलते हुए नहीं देखा, इसका यह अर्थ नहीं कि उसने कभी क्रिकेट खेला ही नहीं। उलटे वह तो सौ शतक लगाकर बैठा है!

यही बात इस परिप्रेक्ष्य में भी कही जा सकती है कि अगर आपने किसी व्यक्ति को किसी विषय पर लिखते हुए नहीं देखा, इसका यह अर्थ नहीं कि उसने उस पर लिखा ही नहीं है।

बहुत सम्भव है कि उसने उस विषय पर सौ शतक लगा रखे हों! या यह भी सम्भव है कि आप अभी एक बालक भर ही हैं!

लेखक : देश के जाने-माने पत्रकार हैं।

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