एग्जिट पोल पर भरोसा कितना सही, कितना गलत

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जानिये, एग्जिट पोल के बारे में ए टू जेड

रांची। आम हो या खास, सभी को चुनाव खत्म होते ही एग्जिट पोल का इंतजार रहता है। यह जानने की उत्सुकता लोगों को बेकरार किये रहती है कि किसकी जीत संभावित है।

इसलिए लोग मतगणना के इंतजार से पहले ही जीत और हार का रूझान जान लेना चाहते हैं। हालांकि एग्जिट पोल वोटरों से की गई बातचीत के आधार पर पूर्वानुमान ही होते हैं।

परंतु अक्सर ये नतीजों के काफी करीब पाये गये हैं, इसलिए लोग उत्सकुता से एग्जिट पोल का इंतजार करते हैं।

दरअसल, एग्जिट पोल वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से चुनाव खत्म होने के बाद मतदान केंद्रों से बाहर निकलने वाले मतदाताओं से पूछताछ की जाती है कि उन्होंने किस उम्मीदवार या पार्टी को वोट दिया।

इस जानकारी के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि चुनाव के नतीजे क्या हो सकते हैं।

एग्जिट पोल का उद्देश्य मतदान समाप्त होते ही संभावित परिणामों की भविष्यवाणी करना होता है।

एग्जिट पोल का इतिहास

एग्जिट पोल के इतिहास की बात की जाये, तो इसकी शुरुआत 20वीं सदी के मध्य में हुई थी।

सबसे पहले एग्जिट पोल का उपयोग संयुक्त राज्य अमेरिका में 1967 में किया गया था। ग्राफर रिसर्च एंड पोलिंग कंपनी ने इसे विकसित किया था।

धीरे-धीरे, इस तकनीक का उपयोग अन्य देशों में भी होने लगा। भारत में एग्जिट पोल का प्रचलन 1980 के दशक में शुरू हुआ।

तब से हर चुनाव में यह होता आ रहा है। खास तौर पर टीवी न्यूज में आई क्रांति के कारण एग्जिट पोल अब किसी भी आम चुनाव का एक हिस्सा ही प्रतीत होने लगा है।

अब तो की सर्वेक्षण एजेंसियां सिर्फ यही काम करती हैं और विभिन्न न्यूज चैनलों को अपनी रिपोर्ट देती हैं।

आम तौर पर एग्जिट पोल की सटिकता से लोग प्रभावित होते हैं और यह जानना चाहते हैं कि आखिर यह होता कैसे है।

कैसे इतना सटीक पूर्वानुमान लगाया जाता है। तो आपको बता दें कि एग्जिट पोल करने की प्रक्रिया में कई विधियां अपनाई जाती हैं।

इनमें सबसे महत्वपूर्ण होता है नमूना चयन। एग्जिट पोल करने के लिए सबसे पहले उन मतदान केंद्रों का चयन किया जाता है, जिन्हें जनसंख्या के प्रतिनिधि नमूने के रूप में चुना जाता है।

यह चयन जनसांख्यिकी, भौगोलिक स्थिति और पिछले चुनाव परिणामों को ध्यान में रखते हुए किया जाता है।

यह काफी महत्वपूर्ण चरण होता है, क्योंकि नमूना चयन में थोड़ी भी लापरवाही हुई, तो ये नतीजों पर असर डाल सकते हैं।

सर्वेक्षण एजेंसियां एग्जिट पोल के लिए प्रश्नावली तैयार करती हैं। विभिन्न सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों से सुझाव प्राप्त कर भी ये प्रश्नावली तैयार की जाती है।

प्रश्नावली के द्वारा मतदाता से पूछा जाता है कि उसने किसे वोट दिया। इसके अलावा, अन्य जानकारी जैसे कि मतदाता का लिंग, आयु, जाति, धर्म आदि भी संकलित की जाती है।

इसके बाद की प्रक्रिया होती है मतदाताओं से बातचीत। मतदान समाप्त होने के बाद एग्जिट पोल के सर्वेक्षणकर्ता बूथ के बाहर खड़े होकर मतदाताओं से उनकी पसंद के बारे में पूछताछ करते हैं।

यह पूछताछ गुप्त रूप से की जाती है, ताकि मतदाता स्वतंत्र रूप से अपनी राय व्यक्त कर सके।
इसके बाद का महत्वपूर्ण चरण होता है डेटा संग्रहण और विश्लेषण।

एकत्रित आंकड़ों को तुरंत ही संग्रहीत और विश्लेषित किया जाता है। इसके लिए कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर और विश्लेषण तकनीकों का उपयोग किया जाता है, ताकि तुरंत परिणामों का पूर्वानुमान लगाया जा सके।

इसके बाद अंतिम चरण में एग्जिट पोल के अनुमानित परिणामों को चुनाव आयोग की अनुमति मिलने के बाद मीडिया के माध्यम से जनता के सामने पेश किया जाता है।

अब सवाल उठता है कि एग्जिट पोल जरूरी है क्या, इसके फायदे क्या हैं। तो इसे हम एक वाक्य में यही कह सकते हैं कि यह एक त्वरित अनुमान है, आम लोगों की परिणाम जानने की जिज्ञासा को कम करता है।

एग्जिट पोल के माध्यम से चुनाव परिणामों का अनुमान चुनाव समाप्त होते ही प्राप्त किया जा सकता है और यही इसका सबसे बड़ा फैक्टर है।

एग्जिट पोल से विभिन्न क्षेत्रों, जातियों, और आयु समूहों के मतदान रुझानों का विश्लेषण किया जा सकता है।

साथ ही यह एक तरीका है, जिससे जनता की वास्तविक राय सामने आती है।

अब सवाल उठता है कि एग्जिट पोल कितने सटीक होते हैं और इनकी चुनौतियां क्या हैं। तो बता दें कि एग्जिट पोल हमेशा सटीक नहीं होते।

कई बार ये गलत पूर्वानुमान भी दे सकते हैं। अगर नमूना चयन सही तरीके से नहीं किया गया हो तो परिणाम गलत हो सकते हैं।

कुछ मतदाता सही जानकारी नहीं देते जिससे डेटा में विकृति आ सकती है। यही कारण है कि एग्जिट पोल को लेकर कई बार आलोचनाएं भी होती हैं।

एग्जिट पोल के परिणाम मतदाताओं पर प्रभाव डाल सकते हैं, विशेषकर यदि कोई मतदान शेष हो तो।

कुछ राजनीतिक दल एग्जिट पोल के परिणामों को प्रभावित करने की कोशिश कर सकते हैं।

मीडिया द्वारा गलत तरीके से एग्जिट पोल के परिणामों को पेश किये जाने की भी आशंका बनी रहती है।

बावजूद इसके आम तौर पर एग्जिट पोल के पूर्वानुमान वास्तविक नतीजों के करीब रहे हैं। इसलिए लोगों का इन पर भरोसा बढ़ा है।

भारत में कई बार एग्जिट पोल ने सही अनुमान लगाए हैं, जबकि कई बार वे पूरी तरह से गलत साबित हुए हैं।

पिछले कई चुनावों में एग्जिट पोल की सटीकता में कई बार उतार-चढ़ाव देखा गया है। कुछ मामलों में, वे वास्तविक परिणामों के काफी करीब रहे हैं, जबकि अन्य मामलों में उन्होंने वास्तविक परिणामों से काफी भिन्न परिणाम दिखाए हैं।

साल 2004 के लोकसभा चुनावों में अधिकांश एग्जिट पोल ने एनडीए की जीत का अनुमान लगाया था, जबकि वास्तव में यूपीए ने जीत दर्ज की थी।

वहीं, 2014 में अधिकांश एग्जिट पोल ने सही तरीके से बीजेपी की जीत का अनुमान लगाया था। पिछले साल 2023 में 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए थे।

इसमें दो राज्यों राजस्थान और मध्य प्रदेश के नतीजों ने एग्जिट पोल के पूर्वानुमान को पूरी तरह गलत साबित कर दिया था।

अंत में हम यही कहेंगे कि एग्जिट पोल केवल एक अनुमान होते हैं और उन्हें अंतिम परिणाम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

वे एक संकेत दे सकते हैं, लेकिन अंतिम फैसला मतगणना के बाद ही पता चलता है।

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