नयी दिल्ली: लोकसभा के 153 निर्वाचन क्षेत्रों में वन अधिकार अधिनियम-2006 महत्वपूर्ण मुद्दा है और इनमें से 103 सीट का निवर्तमान लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) प्रतिनिधित्व करती है। यह जानकारी एक हालिया रिपोर्ट में दी गई है।
स्वतंत्र संगठन ‘वसुंधरा’ के विश्लेषण के मुताबिक इस कानून को लाने वाली कांग्रेस का 11 सीट पर कब्जा है जबकि इतनी ही सीट पर ओडिशा में सत्तारूढ़ बीजू जनता दल (बीजद) काबिज है।
इसी प्रकार शिवसेना छह सीट, भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) और वाईएसआर कांग्रेस पांच-पांच सीट और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी चार सीट का प्रतिनिधित्व करती हैं।
अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों के साथ हुए कथित ऐतिहासिक अन्याय के समाधान की दिशा में एक मील का पत्थर माने जाने वाले वन अधिकार अधिनियम 2006 का उद्देश्य पीढ़ियों से जंगलों में रहने वाले ऐसे समुदायों के वन अधिकारों को मान्यता देना है।
विश्लेषण के अनुसार 86 लोकसभा सीट ऐसी हैं जहां वन अधिकार के तहत अर्हता रखने वाले लोगों की संख्या 30 प्रतिशत से अधिक है।
इसी प्रकार 45 ऐसी सीट हैं जहां पर कुल मतदाताओं में से करीब 40 प्रतिशत एफआरए के तहत लाभ की योग्यता रखते हैं।
इनमें से झारखंड की खूंटी सीट भी है जहां से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जनजातीय मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा को फिर से अपना उम्मीदवार बनाया है।
वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के प्रभाव वाली 153 सीट में से 74 ऐसी सीट ऐसी थीं जहां पर 2019 में कांग्रेस और भाजपा का सीधा मुकाबला हुआ था और इनमें से कांग्रेस को महज पांच सीट पर जीत मिली थी।
भारत में अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए 47 लोकसभा सीट आरक्षित हैं जिनमें 42 मुख्य एफआरए निर्वाचन क्षेत्र हैं।
2019 में भाजपा ने इनमें से 31 सीट पर जीत दर्ज की थी जबकि तीन कांग्रेस के खाते में गई थीं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में एफआरए दावा निपटान दर 87.72 प्रतिशत से घटकर 84.44 प्रतिशत रह गई है।
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