चुनावी बॉण्ड योजना सबसे बड़ा घोटाला, चुनावों के लिए सरकारी वित्त पोषण की जरूरत: येचुरी

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नयी दिल्ली, एजेंसियां : मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता सीताराम येचुरी ने कहा है कि चुनावी बॉण्ड योजना स्वतंत्र भारत में ‘‘सबसे बड़ा घोटाला’’ है जिसमें ‘‘माफिया की तरह उगाही’’ हुई है।

उच्चतम न्यायालय चुनावी बॉण्ड योजना को रद्द कर चुका है। बॉण्ड को न्यायालय में चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं में माकपा भी शामिल थी।

येचुरी ने कहा कि इस योजना को लेकर उनका विरोध सिद्धांतों पर आधारित है और चुनावों के लिए सरकार के वित्त पोषण से पारदर्शिता आ सकती है।

येचुरी ने कहा, “चुनावी बॉण्ड स्वतंत्र भारत में सबसे बड़ा घोटाला बन गया है। इन चुनावी बॉण्ड को लेकर हमने जो अनुमान लगाया था, वही अब सामने आ रहा है।

मैंने कहा था कि यह माफिया की तरह जबरन वसूली जैसा होगा। इसे अब हो रहे खुलासों से देखा जा सकता है।’’

माकपा नेता ने कहा कि जब योजना की पहली बार घोषणा की गई थी तो उन्होंने आगाह किया था कि ‘इससे साठगांठ के सौदे’ होंगे।

उन्होंने कहा, ‘‘काले धन से निपटने या उस पर नियंत्रण लगाने के बजाय, आप वास्तव में धन शोधन की अनुमति दे रहे थे।

आप काले धन को सफेद में बदलने और वैध बनाने की अनुमति दे रहे थे। कंपनियों ने अपने सालाना मुनाफे से कई गुना ज्यादा कीमत के चुनावी बॉन्ड खरीदे।’’

उन्होंने विभिन्न जांच एजेंसियों की जांच के घेरे में आई कंपनियों द्वारा खरीदे गए बॉण्ड का हवाला देते हुए कहा कि फर्जी कंपनियों का इस्तेमाल धन शोधन के लिए किया गया।

येचुरी ने कहा, ‘‘एक नयी बात जो सामने आई है कि ऐसी दवा कंपनियों ने चुनावी बॉण्ड खरीदे जो उत्पादन के लिए गुणवत्ता नियंत्रण और मानदंडों का उल्लंघन करने को लेकर जांच के दायरे में हैं। यह खतरनाक है।’’

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ईडी समेत जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और सत्तारूढ़ दल को चुनावी वित्तपोषण के बीच किसी भी तरह के संबंध से इनकार करते हुए कहा है कि ये आरोप सिर्फ धारणा पर आधारित हैं।

शीर्ष अदालत ने 15 फरवरी को अपने ऐतिहासिक फैसले में केंद्र की चुनावी बॉण्ड योजना को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था और बॉण्ड संबंधी विवरण के खुलासे का आदेश दिया था।

यह पूछे जाने पर कि चुनावी वित्तपोषण में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का क्या तरीका हो सकता है, उन्होंने कहा, ‘‘यदि आप राजनीतिक चंदे को पारदर्शी बनाना चाहते हैं, तो कॉरपोरेट घरानों को चंदा देना चाहिए, लेकिन सीधे राजनीतिक दलों को नहीं।’’

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