शक्ति पांडेय
इन दिनों देवघर में हूं और यहां के सुदूर गांवों घूम रहा हूं। वसंत पंचमी को मां सरस्वती की आराधना का दिन है। कलाप्रेमियों के लिए बेहद खास दिन। विद्या और बुद्धि की देवी के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का यह दिन है।
14 फ़रवरी का यह दिन पड़ा है। पर इसी दिन देवघर में बाबा भोलेनाथ को दहेज़ भी चढ़ाया जाता है, यह मुझे मालूम नहीं था।
शिवजी के ससुराल यानि बिहार के मिथिलांचल ज़िलों से हज़ारों की संख्या में साला और उनके परिजन देवघर आये हैं।
मोटे- मोटे बांस के कांवर में बांस की टोकरी के अंदर ढेर सारा दहेज़ का सामान लेकर। ऐसा कांवर मैं पहले नहीं देखा था। ये उनके खुद के बनाये हुए हैं।
आज मंदिर परिसर के आसपास की सभी सड़कें ठहर से गयी थी दहेज़ टीम की भीड़ के कारण। मुझे एक पत्रकार ने बताया कि ये जब आते हैं बिहार से तो देवघर के लोग सतर्क हो जाते हैं।
क्योंकि ये लोग अपने घर से दहेज़ सामान के अलावा कुछ नहीं लाते। खाने – पीने, रहने,बर्तन, जलावान की लकड़ी आदि सब ये यहीं से जुगाड़ करते हैं।
जुगाडी के दौरान ये किसी से मांगते नहीं, उठा लेते हैं, कब्ज़ा कर लेते हैं। क्योंकि ये सोचते हैं कि वे अपने बहनोई (ज़ीजा) के घर आये हैं। बहनोई का ही सारा सामान, पेड़ – पौधे, सडक, पानी आदि हैं।
इसलिए उन्हें उन समानों के उपयोग के लिए किसी व्यक्ति से इज़ाज़त लेने की क्या ज़रूरत। जिसका जो सामान हाथ लगा, उठा लिए। चूल्हा जलाने के लिए पेड़ काट दिया।
जहां मन वहां शौच कर दिया, कहीं भी सो लिया, बैठ लिया। कोई कुछ नहीं बोलता। देवघरवासी ही नहीं, पुलिस – प्रशासन भी यह जानता है, कि ये लोग अपने बहनोई के घर हर वर्ष दहेज़ चढ़ाने आते हैं।
कहीं कोई इन्हें नहीं रोकता। बिलकुल हुर्मूट कि तरह बड़ा – मोटा भारी कांवर लेकर जब ये सड़क पर चलते हैं। लोग डर से पहले ही सड़क से हट जाते हैं।
कल रात को मैं भी देखा,. भीड़ के बीच से ये जब गुज़र रहे थे, लोगों को धक्का मारते ये आगे बढ़ रहे थे। भारी कांवर जो इनके कंधे पर था।
भोलेनाथ को दहेज़ में ये – भांग, धतूरा, भस्म, सिंदूर आदि. चढ़ाते हैं। इस दौरान इनकी वेश – भूषा सावन महीने की तरह भगवा रंग की होती है।
वसंत पंचमी के दूसरे दिन से ये मिथिलांचल वापस लौटने लगते हैं। वसंत माह में इनके देवघर आने से सावन सा नज़ारा देखने को मिलता है और एक उत्साहपूर्ण वातावरण दिखाई देता है।
लेखक : वरिष्ठ पत्रकार हैं।
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