क्या चेतना का कोई इतिहास होता है?

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सुशोभित

क्या चेतना का कोई इतिहास होता है, विशेषकर उसके शोक का, पीड़ा का? पीड़ा की अनुभूति जिस चेतना में दर्ज़ होती है, क्या वह केवल वैयक्तिक होती है?

देह के नाश के बाद उसका कोई डेटा, कोई दस्तावेज़ कहीं सहेजा जाता होगा? क्या विलाप, रुदन और क्रन्दन का कोई सार्वभौमिक-परिप्रेक्ष्य भी होता है?

यह विचार मुझे एक मां के क्रन्दन को देखकर आया। उसके बच्चे को उससे छीन लिया गया था। मोटरगाड़ी में ले जा रहे थे, वह पीछे दौड़ रही थी। देर तक दौड़ती रही, पर उसकी गति की सीमा थी।

वो उसे ले गए। मां की आत्मा में आर्तनाद गूंजता रहा। वह एक भैंस थी। यह पढ़ते ही आप मुंह बिदका लेंगे और कहेंगे, ओफ्फो, फिर से वही पशुओं वाली बक़वास! हां, बक़वास ही है, बशर्ते चेतना का कोई इतिहास न हो।

और मैं मान नहीं पाता कि नहीं है। और अगर है तो क्या वह किसी घनघोर मेघमाला की तरह सामूहिक अवचेतन पर आच्छादित होता होगा या नहीं? हमें अकारण व्यथित करता होगा या नहीं?

एक गाय को दुहा जा रहा था, उसकी आंखों में आंसू थे। यह दृश्य मैंने अभी-अभी एक गोशाला में देखा। गाय विरोध नहीं कर रही थी, पर वह चुपचाप रो रही थी।

यह दूध उसके बच्चे के लिए था, पर पत्थर की पिंडी पर चढ़ाकर परनालों में बहा दिया जायेगा। उसका विलाप मैंने न देखा होता तो किसी इतिहास में दर्ज़ होता? मैं पूछता हूं।

ईश्वर का बेटा जिस दिन मरकर फिर से जी उठा था, उसकी याद में उसके पंथ को मानने वाले भेड़ के बच्चों को मारकर खाते हैं- ईस्टर लैम्ब! ईश्वर के बेटे को पुनर्जीवन मिला तो ईश्वर के बच्चों की हत्या करके उत्सव? क्या प्रवंचना की कोई सीमा है?

मैंने देखा, सहस्रों नन्हें मेमने अपनी मांओं से अलगा दिए गए हैं, उन्हें क़त्लख़ानों में ले जाया जा रहा है। सफ़ेद फ़रिश्तों-सी नन्हीं जिन्दगियां जो इस वक़्त केवल अपनी मां के साये में छुप जाना चाहती थीं, उन्हें हुक पर लटकाकर उनका गला रेत दिया जायेगा।

क्या यह कहीं दर्ज़ किया जायेगा या नहीं? और अगर नहीं तो क्यों नहीं?मनुष्य का रुदन कविता में ढल जाता है। सिनेमा का दृश्य उस क्षण को भींच लेता है।

या छायाचित्र की कोई अनमनी उसांस। विलाप जब कला में चित्रित होता है तो वह संसार के समस्त सहधर्मियों को एकसूत्र में बांधता है। उसे देखकर प्रेक्षक कहते हैं हां, मैं भी कभी ऐसे रोया था, जैसे नायक इस दृश्य में रोता है।

इससे चेतना का इतिहास बना या नहीं? एक निजी अनुभूति सुदूर तक व्यापी या नहीं? उसका सार्वभौमिक-परिप्रेक्ष्य निर्मित हुआ या नहीं?

ठीक वैसा ही चेतना का इतिहास, उन बकरियों का जिन्हें घर पर बच्चों की तरह पोसकर, घर के बच्चों के ही सामने जिबह कर दिया गया था। उनके कल्पनालोक में कौन-सी छवियां तैरती होंगी मृत्यु के समय? कौन-से आश्चर्य? और कैसी पीड़ा? इस पर कोई कविता लिखेगा, सिनेमा बनायेगा? नहीं तो क्यों नहीं?

यही सब बातें सोचता रहा, जब मेरे शहर में एक निर्माणाधीन वधशाला का चित्र समाचार-पत्र में दिखलाई दिया। बड़ी मशीनें लगाई जा रही थीं, बड़े बंदोबस्त थे।

दावा था कि यहां बड़ी सफ़ाई से क़त्ल किया जावेगा। कितनी सफ़ाई से? इतनी कि ख़ून की एक बूंद भी न छलकेगी? या इतनी कि चीख़ें भीतर ही घुट जायेंगी?

उसके दैत्याकार हुकों को देखकर मैं सोचने लगा, जिन भोले बच्चों को यहां मारकर टांगा जायेगा, वो इस वक़्त कहां पर होंगे? क्या करते होंगे?

क्या उन्हें मालूम होगा कि उनकी हत्या का इंतज़ाम मनुष्यों की दुनिया में एक ऐसी सर्वस्वीकृत वस्तु होगी कि अख़बार उसका फ़ोटो छापेंगे और पाठक उसे देखकर नज़र फेर लेंगे, मानों कुछ देखा ही न हो। मैं तो नहीं मरा ना, मेरे घर का तो कोई नहीं, मेरी जाति तक का नहीं। फिर मुझे क्यों फ़र्क़ पड़ता हो?

पर मुझे फ़र्क़ पड़ता है। मेरी चेतना के इतिहास का यह सबसे स्याह अध्याय है कि रक्तपात से भरी इस पृथ्वी में मूक और निर्दोष की हत्या को अवश्यम्भावी की तरह स्वीकार कर लिया गया है।

मैं इसे कभी स्वीकार नहीं कर सकता। और मेरा यह अस्वीकार वध हुए पशुओं की तरह नि:शब्द न रह जावे, इसलिए इसे यहां लिख रहा हूं।

इसे आप पढ़ेंगे तो यह आपकी भी चेतना का इतिहास बन जावेगा। इसकी उपेक्षा भले आप कर दें, इसके कलंक से बच नहीं सकेंगे!

लेखक : देश के जाने-माने पत्रकार हैं।

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