मध्य-प्रान्त के नागरिक को दिल्ली बहुत थकाती है

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सुशोभित

ई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुंचते ही पता चला, दिल्ली से भोपाल को जाने वाली रेलगाड़ी अपने निर्धारित समय से तीन घंटा पीछे चल रही है।

मैं तो आदतन समय से एक घंटा पहले ही स्टेशन आ गया था। वहीं बाहर कुलियों की ट्रॉली पर धप्प से बैठ गया। दौड़धूप से भरे दो दिनों, जिनमें स्नायुतन्त्र अपनी अन्तिम सीमा तक खिंच गया हो, के बाद पस्त देह और मन लिए।

फिर कुछ देर सुस्ताकर उठा, और लगेज समेत मेले से ख़रीदी किताबों का गट्ठर लादकर रेल पुल पर चला आया। यात्री विश्रामगृह में बटजोही का मुसाफ़िर बनके जा टिका।

मुंह-हाथ धोए, सुविधाघर में कपड़े बदले (मेले के लिए नई कमीज़ और पतलून खरीदकर पहनी थी जिसे ट्रेन में मैला नहीं करना चाहता था), कुछ खाया जो मिला, और गहरी सोच में डूब गया।

मन के पटल पर दो दिनों में हुई घटनाओं की फ़िल्म-सी चलने लगी। जैसे बाढ़ हो! मुस्कराकर थक गए थे जबड़े, अत्यधिक बोलने से कंठ में चली आई थी शिथिलता।

भोपाल में महीनों जितना नहीं बोलता उतना यहां बोला और पूरे वर्ष जितने लोगों से शायद ही मिलता, उससे कहीं अधिक से मिला। कदम-कदम पर फूटते चौराहे।

चप्पे-चप्पे पर पहचाने चेहरे। कुछ जो गुमकर फिर मिले, कुछ जो कभी मिले ही न थे पर खूब पहचान थी। जैसा एकरस, नियमबद्ध जीवन अपने नगर में बिताता हूं, उसमें दो दिनों का एक मायावी स्वप्न!

मध्य-प्रान्त के नागरिक को दिल्ली बहुत थकाती है, मैं दिल्ली को हमेशा एक थकान की अनुभूति की तरह याद रखता हूं।

ये दीवाना शहर ख़ुद ही एक बड़ा मेला है, तिस पर इसमें यह किताबों का मेला था। इस मेले में भिन्न ही, आश्चर्यवत ऊर्जा पूरे समय रहती है।

मेलजोल की भावना इसे कंधों पर उठाकर घूमती है। हर दूसरे चेहरे को देख चहक उठने, तपककर हाथ मिला लेने, गले मिल जाने, पीठ पर धौल जमा देने की तत्परता-ललक यहां संक्रामक है।

किताबें जमकर ख़रीदी जाती हैं, लेखकों से दस्तख़त लिए जाते हैं। समूह-तस्वीरें उतरवाई जाती हैं। प्रकाशक बांछे खिले निहाल होते हैं, उनके लिए यह फ़सल कटाई के त्योहार जैसा है!

इस एकाकी, दुष्प्राप्य और गोपनीय लेखक ने स्वयं को इसी मेले के बीच में पाया था और बचने की कोई गुंजाइश नहीं थी। पहाड़ पर बना शहर भी भला कभी छुपता है?

पर मेला अब खुल रहा है। सब लौट रहे हैं। सबके हाथों में किताबों के बंडल और झोले हैं। लेखक भी किताबें लेकर लौट रहा है और सोच रहा है कि इन दिनों में जितनी बातें उससे कही गईं, जितनी प्रशस्तियां, उसके प्रति जितनी ललक जतलाई गई, क्या वह उसी के लिए थी?

कहीं किसी को भ्रम तो नहीं हुआ था? इस दुविधा में अनमना अगर वह किसी से थोड़ी कम ऊष्मा और शक्ति से मिल पाया हो तो इसके लिए उसे क्षमा कर दें।

यह घर लौटने की वेला है, अपने भीतर लौटने की भी! विश्रामगृह में ही बैठकर फोन पर यह लिख रहा हूं। रेलगाड़ी अब आती ही होगा।

बिना शुकराना अदा किए अगर यहां से लौट जाता तो नाशुक्रा कहलाता और उन सबके प्रति बेअदबी होती, जो इतने उत्साह से मिले थे।

इसलिए कहता हूं, इन दो दिन में मिले सभी साथियों को मेरी तरफ से बहुत प्यार और बहुत सारा शुक्रिया!

लेखक : वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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