भाजपा की वोट पाने की अचूक राजनीति!

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विवेकानंद सिंह कुशवाहा

भाजपा ने राज्य के अनुसार ओपन सोर्स ओबीसी जातियों को खोज कर अपने वोट बैंक को बढ़ाने की दिशा में अच्छी राजनीति की है।

खासकर कुशवाहा जाति को अच्छे से टार्गेट किया है, जो विविध राज्यों में अलग-अलग नामों (शाक्य, सैनी, माली, मौर्य, दांगी, कोइरी आदि) से जाने जाते हैं।

बीते दिन हरियाणा में नायब सिंह सैनी जी को राज्य का मुख्यमन्त्री बनाया गया। लोकसभा चुनाव में महीने भर का भी समय नहीं बचा है, वहीं हरियाणा में छह माह बाद विधानसभा चुनाव होंगे।

ऐसे में नायब जी को महीने भर पहले पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष और फिर हरियाणा का मुख्यमन्त्री बनाना विशुद्ध रूप से लोकसभा चुनाव में लाभ लेने की कवायद का हिस्सा है।

यह समाज को सम्मान देने का ढोंग भर भी हो सकता है। हालांकि, इसका लाभ भाजपा को हरियाणा में जो मिले सो मिले, इसका बड़ा लाभ उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र तक में मिलेगा।

इसी तरह भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य को भी चुनाव हारने के बाद भी डिप्टी सीएम बना दिया, इससे यूपी समेत अन्य राज्यों के अधिकांश कुशवाहा-मौर्य गदगद हो गये। फिर अमरपाल मौर्य को राज्यसभा भेज दिया।

ठीक इसी प्रकार बिहार में सम्राट चौधरी को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाने के साथ भाजपा के विधायक दल का नेता और बिहार का उप मुख्यमन्त्री बना दिया।

बिहार में भी अगले साल विधानसभा चुनाव होंगे। देखना होगा कि उस समय भी वे नेता विधायक दल रहेंगे या नहीं।

इसके साथ-साथ भाजपा ने राजस्थान में ‘कच्छवाहा’ क्लैन से आने वाली दिया कुमारी को डिप्टी सीएम बना दिया। इस फैसले से दोहरा लाभ लेने की कोशिश है, क्योंकि जातीय महासभा के लेवल पर कच्छवाहा, राजपूतों के मुकाबले कुशवाहों के ज्यादा करीब हैं।

इन सभी फैसलों के पीछे की मंशा लोकसभा चुनाव में इस समाज के कम-से-कम उम्मीदवार देकर भी सारे वोट पा लेना भर हो सकता है।

इसका असर यूपी की भाजपा की लिस्ट में दिखा भी। साथ ही भाजपा की मंशा इस समाज के क्षेत्रीय क्षत्रपों (राजकुमार सैनी, बाबू सिंह कुशवाहा, उपेंद्र कुशवाहा आदि) की राजनीति को भी ज्यादा न पनपने देने की है। यह नीति सत्ता से वंचित रही ओबीसी की छोटी-छोटी अन्य जातियों के साथ भी भाजपा ने अपनायी है।

उदाहरण के लिए यूपी में निषाद पार्टी, अनुप्रिया पटेल की पार्टी, अब ओमप्रकाश राजभर की पार्टी, फिर बिहार में जीतनराम मांझी की पार्टी, मुकेश सहनी आदि शामिल हैं।

चूंकि, चिराग पासवान के पास अपने पिताजी रामविलास पासवान की खड़ी की हुई इमारत है, इसलिए भाजपा को झुक जाना पड़ रहा है।

नीतीश कुमार के रहने तक जदयू भी यदि खुद को रिवाइव नहीं कर पायी तो जदयू का भविष्य भी अधर में लटक जायेगा।

क्योंकि नीतीश कुमार के बाद जदयू में जनाधार वाले जमीनी नेता नगण्य हैं। एक आईएएस को आगे करने का हस्र देख ही चुके हैं लोग।

दूसरे को आगे करने की कोशिश में कुछ लोग जुटे हैं। देखते हैं आगे क्या होता है, लेकिन ओबीसी की इन जातियों को समझदारी से अपने फैसले लेने की जरूरत है।

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