कला फिल्में जिनकी यादें दिल से कभी नहीं मिटेगी

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सुशोभित

1970 और 1980 के दशक में हिन्दी में जो समान्तर सिनेमा बनाया गया था, उससे मेरे मन का तारतम्य बहुत कम उम्र से ही जुड़ गया था। ये ‘कला फिल्में’ कहलाती थीं। इस बात पर मुख्यधारा के लोकप्रिय सितारे ऋषि कपूर बहुत बिगड़ते थे। वो कहते थे, “अगर ये ‘कला फिल्में’ हैं तो हम जो नाचते-गाते, लोगों का मन बहलाते हैं, उसमें कला नहीं है?” बात उनकी सही थी।

कला उसमें भी थी। पर कला का मूल्यांकन उसके इरादों और मनसूबों से किया जाता है। जिस कला का व्यवहार जनता का मनोरंजन कर धन कमाने के उपकरण की तरह किया जाता है, वह अपने इसी अभिप्राय के चलते ऊँचे मेयार की कला नहीं बन पाती है। इसके उलट व्यक्ति और समाज के गम्भीर अंतर्सत्यों का उद्घाटन यह जानने के बावजूद करने वाली कला कि आमजन को यह बात रुचिकर नहीं लगती और इसमें आर्थिक सफलता नहीं मिलेगी, क़द में स्वयमेव ही बड़ी हो जाती है।

1980 के दशक के अंत में जब दूरदर्शन पर हर रविवार को अमिताभ या मिथुन की फिल्मों का बेसब्री से इंतज़ार किया जाता था, तब एक बार उन्होंने ‘सारांश’ चला दी। सबों ने माथा पीट लिया कि आज यह कैसी नीरस फिल्म इन्होंने लगा दी है। पर मैं टकटकी बाँधे देखता रहा। शुरू से आखिर तक देख गया। मुझे बहुत तीक्ष्णता से यह अनुभव हुआ कि इस फिल्म में एक ऐसे तत्त्व को उभारा गया है, जिसे अभी तक मैंने सिनेमा में नहीं देखा था। उसमें मनुष्यता के गहरे आशय थे, यथार्थ का काव्य और कलात्मक उत्कर्ष था। तब मेरी उम्र सात या आठ बरस की ही रही होगी।

अगले दिन स्कूल में जाकर सहपाठियों से उसके बारे में बात करने का प्रयास किया। पाया कि उनमें से किसी ने इसे देखने का कष्ट नहीं उठाया था। एक ने तो उलटे उलाहना दिया, “वह तो बुड्ढों की पिक्चर थी। स्साले, तू भी बुड्ढा ही है, जो ऐसी पिक्चरें देखता है!” मैंने उसकी बात का बुरा नहीं माना। शायद मैं बचपन से ही बूढ़ा था। पर उसी उम्र में मुझे यह अहसास हो गया था कि मेरी रुचियों का संसार मेरे सहपाठियों और समकालीनों से बहुत भिन्न है और इसलिए जीवन में मित्रों से वंचित एकान्त ही मेरी नियति रहने वाली है। यों यह कोई बुरी बात नहीं थी, क्योंकि ये मित्रमण्ड​लियाँ व्यक्ति को भ्रष्ट करने का ही काम करती हैं। “तुझमें दम होगा तो सिगरेट पीकर दिखायेगा!” और “जो मर्द होते हैं वही लड़की छेड़ते हैं!” जैसी फूहड़-चुनौतियाँ देने वाले कथित दोस्तों से दुनिया भरी है, इन्हें मैंने सदैव ही दूर से नमस्ते किया और ‘पीयर-प्रेशर’ का लेशमात्र भी जीवन में अनुभव नहीं किया।

बहरहाल, बाद उसके दूरदर्शन पर अनेक कला-फिल्में एक-एक कर देखी गईं। सामान्यतया माना जाता है कि ऐसी फिल्में उबाऊ होती हैं। जबकि मेरा मत इससे पूरी तरह से विपरीत था। मैंने उन्हें बहुत रोमांचक और मनोरंजक पाया। उनकी तुलना में बॉलीवुड की मसाला फिल्में मुझे बोरिंग लगती थीं। वही मार-धाड़, वही मेलोड्रामा, वही कानफोड़ू पार्श्वसंगीत, वही घिसे-पिटे संवाद, वही नाच-गाना। ऐसी पचासेक फिल्में देखने के बाद आप उन जैसी फिल्मों के बारे में पूर्वानुमान लगाने में सक्षम हो जाते हैं कि अगले दृश्य में क्या होगा। ज​बकि कला-फिल्में पूर्णतया अप्रत्याशित थीं। उनकी कहानियाँ नई और ताज़ी थीं। उनका फिल्मांकन संवेदनशील था। उनमें दिखलाया जाने वाला यथार्थ हमारे उस समय के निम्न-मध्यवर्गीय जीवन के बहुत निकट था, आप उनसे आत्मीयता का अनुभव करते थे।

श्याम बेनेगल की ‘जुनून’ देखते समय मैं टस से मस नहीं हो सका, वह इतनी रोमांचक थी। यही अनुभव मुझे ‘मंथन’ देखते समय हुआ। उसने मुझे पूरे समय आश्चर्य से बाँधे रखा कि भला गाँव-देहात के दूध-विक्रेताओं पर भी कोई फिल्म बना सकता है। ‘अंकुर’ अत्यंत मनोरंजक थी- मनोरंजन के प्रचलित अर्थों में भले नहीं। ‘जाने भी दो यारो’ ने हँसा-हँसाकर मुझे बेहाल कर दिया। मुझे बतलाया गया था कि नसीरुद्दीन शाह कला फिल्मों का अमिताभ बच्चन है। ऐसी कोई कला-फिल्म नहीं होती थी, जिसमें नसीरुद्दीन शाह अवतरित न होता हो। वह यत्र-तत्र-सर्वत्र था। साथ ही स्मिता पाटिल, शबाना आज़मी, ओम पुरी, फ़ारूख़ शेख़, पंकज कपूर, अनंत नाग, गिरीश कर्नाड आदि के चेहरे नियमित रूप से नज़र आते। इन फिल्मों की अपनी ही एक दुनिया थी।

दूरदर्शन पर ‘थोड़ा-सा रूमानी हो जाएँ’ देखते समय ज़रूर मैं थोड़ा डोला। उसकी नाटकीय संवाद-अदायगी से मैं स्वयं को जोड़ नहीं पा रहा था। कि तभी दृश्य में नाना पाटेकर नमूदार होते हैं और अपने तल्लीन अभिनय से फिल्म को जीवंत बना देते हैं। कला-फिल्मों में मेरा डगमगाया विश्वास पुन: प्रतिष्ठित हो जाता है। 1997 में स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगाँठ के अवसर पर दूरदर्शन पर ‘मैसी साहब’ दिखाई गई और उसको देखते हुए मैंने पाया कि मैं कला-फिल्मों के प्रेम में आकंठ डूब चुका हूँ। सिनेमा में उसी आस्वाद की मुझे ललक थी।

इसके बहुत सालों बाद, जब साल 2008 में मैं उज्जैन-इन्दौर रोज़ाना अपडाउन करता था कि एक दिन इतवार के रोज़ कवि चन्द्रकान्त देवताले का फोन आया, “दूरदर्शन पर ’27 डाउन’ दिखाई जा रही है, तुरंत उसे देखो।” मैंने आदेश का पालन किया और फिल्म देखने के बाद मन ही मन उन्हें शुक्रिया कहा। फिल्म में रेलगाड़ियों से सम्बद्ध अनेक दृश्य थे, जो उस समय की मेरी मनोदशा के अनुकूल थे।

जो मित्र मुझसे अनेक वर्षों से जुड़े हैं, उन्हें याद होगा कि साल 2016 में मैंने समान्तर-सिनेमा पर अनेक माह तक नियमित लेखन किया था। वह अभी तक पुस्तकाकार प्रकाशित नहीं हुआ है, पर निकट-भविष्य में उसे ज़रूर छपवाऊँगा। तब एनएफ़डीसी की सिनेमाज़ ऑफ़ इंडिया शृंखला की डीवीडीज़ के माध्यम से बहुत आर्टहाउस-सिनेमा उम्दा प्रिंट में लैपटॉप पर देखा था। सई परांजपे की ‘स्पर्श’ ने मुझे मुग्ध कर दिया था और मेरा मत है कि वह हिन्दी में बनाई गई सर्वश्रेष्ठ फिल्मों की फ़ेहरिस्त में हमेशा शुमार रहेगी। ‘कथा’ ब​हुत ही मनोरंजक थी। ‘दामुल’ बहुत प्रभावी। पुरबिया ग्राम्य-अंचल के ऐसे चित्र मैंने ​सिनेमा में पहले नहीं देखे थे। ‘चक्र’, ‘निशान्त’ और ‘पार’ ने मुझे विचलित किया। इनमें निर्धनता का कठोर-चित्रण था। पर ‘त्रिकाल’ के लिए मेरे मन में जैसी कोमल-भावना जगी, सो आज तलक क़ायम है। उस फिल्म में चाक्षुष-रति को संतुष्ट करने वाला ऐसा आलोक उभर आया है, जो सर्वथा भिन्न था। ‘गमन’ में एक अनन्य लिरिकल-तत्त्व था। ‘अल्बर्ट पिंटो’, ‘कलयुग’, ‘आक्रोश’ और ‘मासूम’ ने मुझे अपनी कुर्सी से हिलने नहीं दिया था। कौन कहता है कि आर्ट फिल्में नीरस होती हैं?

1990 का दशक आते-आते समान्तर फिल्म-आन्दोलन की धार क्षीण हो गई थी और अब वह लुप्तप्राय ही है। क्योंकि सिनेमा अपने समय को प्रति​कृत करता है और जिस पूर्व-भूमण्डलीकृत, नियतिवंचति भारत का चित्र उन फिल्मों में उभरा था, उसका गुणसूत्र ही अब बदल चुका है। नया भारत चाहकर भी वैसा सिनेमा अब नहीं बना सकता, क्योंकि उसके पास अब वैसा यथार्थ नहीं है और न ही वैसी धीरज-भरी सौंदर्यदृष्टि है- जो गम्भीर होने से संकोच नहीं करती और दर्शकों को लुभाने के लिए व्याकुल नहीं है। यह लेख भूले-बिसरे पैरेलल सिनेमा के प्रति एक आदरांजलि है। उसकी भावभीनी याद आज भी अनेक फिल्म-प्रेमियों के मन में बसी होगी, इसमें मुझे कोई संशय नहीं।

लेखक : देश के जाने-माने पत्रकार हैं।

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