रेडियो की लोकप्रियता को नयी ऊंचाई देने वाले प्रस्तोता थे अमीन सयानी

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मुंबई: ‘‘नमस्कार बहनो और भाइयो, मैं आपका दोस्त अमीन सयानी बोल रहा हूं।’’… यह वो आवाज थी जिसका एक समय लाखों रेडियो श्रेाता बेसब्री से इंतजार किया करते थे और आज भी यह आवाज उनकी यादों में स्थायी रूप से बसी हुई है।

“बिनाका गीतमाला” कार्यक्रम के जरिए रेडियो की लोकप्रियता को नयी ऊंचाई देने वाले प्रस्तोता अमीन सयानी की खनकती आवाज ने दशकों तक श्रोताओं के दिलों पर राज किया।

दशकों तक हर सप्ताह लाखों लोग ‘भारत के रेडियो मैन’ के कार्यक्रम ‘बिनाका गीतमाला’ की प्रतीक्षा करते थे। उनके कार्यक्रम के प्रसारण के समय लोग घरों में रेडियो से चिपक कर बैठ जाते थे।

रेडियो पर उद्घोषणा की अपनी अदा और अपने अंदाज से लाखों देशवासियों के दिलों में जगह बनाने वाली हस्ती अमीन सयानी का मंगलवार रात मुंबई में निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे।

सयानी कोई गायक या वक्ता नहीं थे और वह हिंदी फिल्मी गीतों पर आधारित एक कार्यक्रम के प्रस्तोता थे। उनका कार्यक्रम इतना लोकप्रिय हुआ कि भारत में रेडियो का कोई भी इतिहास उनके योगदान के बिना नहीं पूरा नहीं हो सकता।

उत्साह और गर्मजोशी से भरी उनकी आवाज भले ही अब शांत हो गई। लेकिन बड़ी संख्या में उनके प्रशंसक उनकी शैली और आवाज को अब भी शिद्दत से याद करते हैं।

उन्होंने ऐसे दौर में रेडियो की लोकप्रियता को नयी ऊंचाई दी जब रेडियो का विस्तार हो ही रहा था। वर्ष 1952 से 1988 तक रेडियो सीलोन से प्रसारित कार्यक्रम ‘बिनाका गीतमाला’ को हर सप्ताह उन्होंने श्रोताओं तक पहुंचाया।

वर्ष 1989 में इस कार्यक्रम का प्रसारण आकाशवाणी के विविध भारती से होने लगा। इस बदलाव के बाद भी सयानी के साथ श्रोताओं का पुराना जुड़ाव कायम रहा और कार्यक्रम की लोकप्रियता बरकरार रही।

इस दौरान कई नाम बदल गए और टूथपेस्ट निर्माता कंपनी बिनाका से सिबाका हो गई। कार्यक्रम का नाम भी बदल कर कोलगेट सिबाका गीतमाला रख दिया गया।

लेकिन श्रोता 1994 में इसका प्रसारण बंद होने तक इसे चाव से सुनते रहे। सयानी सिर्फ इस व्यापक लोकप्रिय कार्यक्रम तक ही सीमित नहीं थे।

सयानी ने रेडियो के साथ अपने लंबे जुड़ाव के दौरान, 50,000 से अधिक कार्यक्रम तैयार किए और उन्हें प्रस्तुत किया। इसके अलाव वह 19,000 से अधिक ‘जिंगल’ और विज्ञापनों से भी जुड़े रहे।

लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जैसी दिग्गज हस्तियों के साक्षात्कार के अलावा, उन्होंने आठ साल तक बोर्नविटा क्विज़ प्रतियोगिता की मेजबानी की। सयानी अपने भाई हामिद सयानी की मृत्यु के बाद इस कार्यक्रम से जुड़े थे।

सयानी का जन्म 21 दिसंबर, 1932 को मुंबई के एक बहुभाषी परिवार में हुआ। उनकी शिक्षा मुंबई के न्यू एरा स्कूल और ग्वालियर के सिंधिया स्कूल में हुई। उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई मुंबई के सेंट जेवियर्स से पूरा की।

उनका परिवार देश के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल था। उनकी मां कुलसुम सयानी गांधीवादी थीं और वह एक पाक्षिक पत्रिका ‘रहबर’ चलाती थीं। सयानी 1945 से अपनी मां की सहायता करने लगे जो 1960 तक जारी रखा।

सयानी को बचपन से ही रेडियो के प्रति दिलचस्पी थी और वह आकाशवाणी के बंबई स्टेशन पर बच्चों के कार्यक्रमों में भाग लेते थे।

उनके बड़े भाई हामिद उनके गुरू थे, जो पहले से ही अंग्रेजी के जाने-माने प्रस्तोता थे। हामिद ने युवा अमीन को छोटी उम्र में ही लेखन, निर्देशन में प्रशिक्षित किया।

बाद में वह रेडियो सीलोन से जुड़े और अपार लोकप्रियता हासिल की। उस समय उन्हें प्रति सप्ताह 25 रुपये मिलते थे।

वर्ष 1952 में तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री बी वी केसकर ने आकाशवाणी से हिंदी फिल्मी गानों के प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और उनका मानना था कि हिंदी गाने नैतिक रूप से पतित हैं।

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